Friday, 26 December 2014

यादों के झरोखों से -एक खूबसूरत याद

मेरी सबसे खूबसूरत यादों में एक ऐसी जगह है जिसके बारे में सोच के एक सुकून मिलता है।  वो दृश्य ही अध्भुत है , 
दो कटहल के पेड़ ,चारों और दूर दूर तक फैले हुए लहलहाते खेत , उनपर बहती एक मदमस्त कर देने वाली बयार , कोयल की कुहुक , पम्पिंग सेट मशीन से झर झर निकलता पानी ,  दूर से आती अर्जुन कहांर के मुर्गों की बांग, इन सब के बीच एक सन्नाटा जो सुकून देता है ,और उन कटहल के पेड़ के नीचे हलकी से आँखें मीचा मैं अपनी खटिया पर चेहरे पे गमछा डाले हुए एक ऐसे आनंद में जहाँ मुझे सिर्फ शान्ति  या कहें तो ईश्वर की प्राप्ति होती है। 

ये जगह है मेरे गाँव में मेरा पम्पिंग सेट या वो मशीन जिससे खेतों में  पानी भरते हैं।  मेरी आँखें भले ही बंद थीं पर पर जो मैं देख पा रहा था वो अविस्मरणीय है। 
गेहूं के खेतों के ऊपर जब बसंती हवा चलती है तो बालियां लोटे लेती हैं और उनपर से गुजरती हवा एक अध्भुत आवाज़ पैदा करती है।  वो हवा की सनसनाहट मैं  आज तक नहीं भूल सका  हूँ।  पास में कहारों की बस्ती है किसी ने मेरे लिए गुड और पानी का बंदोबस्त कर दिया था , ताज़े  गुड का स्वाद और ऐसा दृश्य मुझे सच में ईश्वर के नजदीक ले जा रहा था।  मैंने कुछ देर के लिए अपनी आखें बंद की हवा को महसूस किया और सम्पूर्णता की अनुभूति की।  जब जाने लगा तो रास्ते में कुछ बच्चों के साथ खेला बात किया और वापिस उनकी गरीबी दरिद्रता को देखा अफ़सोस किया और अपनी जिंदगी में वापिस दाखिला  ले लिया।  

Wednesday, 24 December 2014

वो सर्दी का मौसम और मटर की सलोनी

जाड़ा यानी सर्दी का मौसम मेरे लिए सदा से ही दुष्कारी रहा है। मुझे सर्दी कुछ ज्यादा ही लगती है और ऊपर से एक नंबर का आलसी हूँ।  सर्दी आपके इन सभी तत्वों को पूरा उभार देती है।  एक दिन मुझसे किसी ने पूछा की तुम्हारा सबसे बड़ा दुश्मन कौन है , मैंने जवाब दिया वो व्यक्ति जो मेरे स्थान को मुझसे छीन  लेता है तब जब मैं  रजाई में हूँ और मुझे एक नया ठंडा स्थान देता है वो मेरा परम शत्रु है।  

लेकिन जब मुझे इतनी तकलीफ है फिर मुझे पिछले १० दिनों से जाड़े की इतनी याद क्यों आ रही है , कारण है अत्यंत परमानन्द देने वाले भोज्य पदार्थ जैसे मटर की सलोनी , तिल गुड की पट्टी , चूड़ा मटर , मटर के पराठे , मटर की पूड़ी , कौरा मटर। मटर यानी मुझे अत्यंत प्रिय।  क्या आनंद होता था  सुबह सुबह यदि थोड़ा सा सूरज निकला है तो उसमे बैठ के गर्म चाय और चूड़ा मटर।  अध्भुत , अविस्मरणीय वातावरण और एक ऐसी सिहरन जो मन को प्रफुल्लित करती है।  

मुझे कोहरा देखे करीब ५ साल हो गए हैं , मैं ये मानता हूँ की ये भी अत्यंत दुखकारी है , परन्तु कोहरे का भी अपना एक आनंद है।  मैं जब छोटा तथा तो सोचता था की जो लोगो के मुह से भाप निकलती है वही कोहरा है , आप विश्वास नहीं करेंगे मैंने कोहरे में भी पतंग उड़ाईं हैं और बाद में वो गल भी गयी है , सबसे दुःख तो १४ जनवरी को होता था जब संक्राति को आप दुष्ट कोहरे के कारण पतंग नहीं उड़ा सकते थे।  कोहरे का फायदा ये है की आप किसी के घर की घंटी बजा के चुपके से भाग सकते हैं। जाड़े का एक और आनंद ये था की मुझे नहाना नहीं होता था क्यूंकि मैं  जल्दी बीमार पड़ता था तो घरवाले भी जोर नहीं देते थे। 

कल मैंने मटर बिकते हुए देखी एक माल में।  एकदम सूखी हुई किसी लायक नहीं और दाम था 90 रुपये किलो।  मैं कुछ देर तो यादों में खो गया पर फिर मैंने एक किलो खरीदा घर लाया , उसे छीला और कौर के खाया।  कोई स्वाद नहीं था बस यादें थी और उन्ही के सहारे खा लिया।  मैंने सोचा की घर चलते हैं बनारस , टिकट देखा तो क्षमता के बाहर  था , और इनबॉक्स में मैनेजर साहेब की इ मेल थी , डिअर अंकुर प्लीज सेंड द डॉक्यूमेंट ASAP . मैंने यादों का पिटारा बंद किया , अंग्रेजी में जवाब लिखना शुरू किया और थैंक्स  एंड रेगार्ड्स के साथ डॉक्यूमेंट बनाने लगा।  
नौकरी ने कुछ दिया तो जरूर लेकिन बहुत कुछ छीन लिया।  ये दिसंबर समाप्त हो रहा है और मैं बिना किसी स्वेटर लुगदी के एक बेस्वाद सी चाय पी रहा हूँ। 
Happy Winters !! जाडा मुबारक। 

Thursday, 6 November 2014

मेरी कहानी -1

अच्छा लगता था जब सब मेरी तारीफ़ करती थे , कितना अच्छा बच्चा है ,  सब टीचर सराहते थे , सबसे आगे बैठता था ( चश्मा का पावर बहुत था ) लेकिन हर किसी का कहा मानता था , मैं चम्पक के आदर्श बालक जैसा था जो भी हो बस अच्छा बने रहना है , सच्चा बालक। 

बात सातवीं कक्षा की होगी मैंने गालियां और लड़कियों के बारे में सुनना शुरू  कर दिया था , सच कहु तो कुछ समझ नहीं आता था पर दिमाग में ये था की ये सब गलत है, गन्दा है , पाप है।  सेक्स के बारे में बायो की किताब में रटा  , न टीचर ने समझाया न मैंने समझा ।  पीछे बैठने वाले लड़के हमेशा बेकार और मूर्ख समझे जाते हैं थे और रहेंगे , लेकिन अब समझ में आता है असली ज्ञान और जिंदगी का आनंद उन्होंने ही लिया है और लेते रहेंगे। उनसे ही ये ज्ञान मिला।  

ये वो कक्षा थी जब मुझे सच में गणित समझ में आना बंद हो गया था , किसी तरह रट्टा मार के शिक्षको के नजर में हीरो बना रहता था , हाँ हिंदी संस्कृत और अंग्रेजी मुझे बहुत पसंद थे और स्कूल  के पहले ही दिन मैं सारी कहानियां ख़त्म कर डालता था। 
विज्ञानं को तो  रट के किसी तरह पास किया जा सकता है गणित फिर भी कठिन है। मुझे नहीं पता मैं कैसे पास हुआ और सच कहूँ तो आज भी मुझसे उस समय की गणित के सवाल नहीं बनते। मेरा पिसना शुरू हो चुका था , लेकिन मैं फिर भी स्कूल और अपने परिवार में अच्छा बच्चा बना रहा। 

जानते हैं मुझसे गलती क्या हुई ? मैंने कभी  खुद को मना ही नहीं किया की ये मत करो।  मैंने सवाल ही नहीं पूछा खुद से या किसी शिक्षक से से की ये क्यों हो रहा है ? क्यूँ क्यूँ क्यूँ  ये शब्द मैंने बंद कर दिया था।  बस अच्छा बना रहा।  

इस बीच मेरा मंच प्रेम जाग चूका था और मेरे मंच पे होने का मुख्या कारन होता था की शिक्षक मुझे पसंद करेंगे और मैं थोड़ा हीरो भी बनूँगा। लेकिन ये अतिशयोक्ति नहीं है की गायन प्रतोयोगिता को छोड़ करके सबमे मैं प्रथम आता था और  एक समय तो ऐसा आया की बाकी बच्चे ये कहते थे की अंकुर अगर भाग ले रहे हैं तो हमारा जाना व्यर्थ है। 

१० वी कक्षा में किस्मत कुछ ठीक हुई और मुझे गणित के अच्छे अध्यापक भी मिले , सच कहूँ तो उन्होंने ही मुझमे गणित के प्रति थोड़ा प्रेम जगाया लेकिन वो गणित बहुत सरल भी थी।  इसी बीच लोगो को मुझमे अभी से एक IITian  दिखने लगा था , अड़ोस पड़ोस के सब घरों से भैया दीदी IIT पहुंच चुके थे और मैंने तो आठवीं से ही ब्रिलिएंट का करेस्पोन्डेडन्ट भी ज्वाइन कर लिया था। अब मुझे मेरा IIT में जाना भी तय लग रहा था। लेकिन अंदर की सच्चाई ये थी की मुझे कुछ भी समझ नहीं आता था बस  मैं सबको खुश कर रहा था। सब खुश भी थे। 

रट्टा मार के और खूब अभ्यास करके दसवीं में 88 % अंक ले आया।  सच कहूँ तो मैं 90 से ज्यादा ला सकता था , आये नहीं लेकिन  मैं ये सब क्यों कर रहा था मुझे नहीं पता।  और अब मेरी जिंदगी में ऐसा पड़ाव आया जिसे मैं आज तक ढो रहा हूँ।  IIT की कोचिंग , उसकी तैयारी।  बस वही सबकुछ हो गया था।  मेरा बचपन दसवीं कक्षा में मर गया और असली अंकुर भी।  मंच  भी दूर हो गया था।  बस यही पता था इज़्ज़त तो IIT जाने में ही है।  कोचिंग में चीज़ें कुछ कुछ समझ भी आतीं थी पर मुझसे सवाल नहीं बनते थे ये सच है , मैं मेहनत करता था पर मुझसे सवाल नहीं हल होते थे।  अंदर ही अंदर मैं  घुटा जा रहा था , बस इंजीनियर बनना है IIT से।  कोचिंग के टेस्ट में तो बुरा हाल था ही स्कूल में भी साख चौपट होने लगी।  लेकिन मैं आदर्श बालक की तरह लगा रहा खुद का और सबका मूर्ख बनाता रहा।  बारहवीं  में तो ये हाल हुआ की मैं गणित के एक परीक्षा में फेल  हो गया।  जीवन में आजतक मैं स्कूल में फेल नहीं हुआ था , मेरे शिक्षक ने पुछा ऐसा क्यों ? मैंने पहली बार निर्भीक होके कहा " सर पढाई नहीं की थी " उस दिन मैं शाम को कोचिंग नहीं गया पिताजी ने कहा अगर नहीं हो रहा तो छोड़ दो।  काफी देर से कहा।  मैंने भी गाँठ बाँध ली १० दिन IIT भूल के गणित पढ़ा , आप विश्वास नहीं करेंगे 90 अंक आये , लेकिन सच वही था  रट्टा और अभ्यास। मुझे समझना अच्छा लगता था और  आता भी था , पर उसे प्रयोग में नहीं ला पाता था।  मैं एक इंजीनियर कभी नहीं था न हूँ। 

जैसे तैसे बारहवीं में 77 % अंक आये , लेकिन सच तो वही था की IIT कोसों दूर , IIT PRE ही नहीं निकला वो तो   बहुत दूर की बात थी।  लेकिन किसी ने मुझसे ये नहीं कहा की BA करो हिंदी अंग्रेजी साहित्य को समझो समाज को समझो कला का आनंद लो और उसे समझो। क्यूंकि वो रोटी नहीं देगा , इंजीनियर      
का पढाई रोटी देगा काम से काम अपना पेट पाल लोगे।  हैरानी मुझे तब होती है अब जब मैं भारत या विश्व के ज्यादातर सम्मानित और प्रभावशाली लोगों को इन्ही विषयों पे पारंगत देखता हूँ और सबसे ऊँचे पदों पे भी। 


आज मैं कागज़ पे इंजीनियर हूँ और अपना पेट ही पाल रहा हूँ , मुझे खुश रहना है क्यूंकि इस देश के ज्यादातर लोगों के पास वो भी नहीं हैं। मैं कंप्यूटर चला लेता हूँ और फिर से वही अपना और दूसरों का मूर्ख ही बना रहा हूँ।  सच ये है की मैं रोज़ तिल तिल के कुढ़ता हूँ और मरता हूँ। 
इतना ही कहूँगा की अपने बच्चों को परखने का प्रयास करिये  वरना जरूर कहीं हज़ारों अंकुर आपका और अपना मूर्ख बना रहे होंगे। 

आगे भी बहुत लम्बी कहानी है , उसे अगले पन्नो में , क्यूंकि मैं  इंजीनियर की पढाई शुरू करने वाला था.....  

Wednesday, 29 October 2014

वो भूला बिसरा जाड़ा बनारस के साथ

सड़कों पे ७  बजे ही सन्नाटा छाने लगा है , ज्यादातर आने जाने वाले कोचिंग से लौटने वाले लड़के हैं जो अपनी साइकिलों लड़कियों के पीछे पीछे चल रहे हैं और सोचते हैं की जीवनसाथी मिल गया।  मफलर पहने हुए मटरू दादा अभी भी मुरारी की दूकान पे  बैठे हैं और रेडियो पे जयमाला कार्यक्रम सुन रहे हैं। मैंने उन्हें बोलते हुए सुना जड़वा साला फिर आ गएल जिनगी नरक बा , ऐ राजेसवा एक अद्धा ले के आओ रे। 

पान की दूकान पे वही लोग मौजूद है जो कादंबरी हलवाई से दूध लेके लौट रहे हैं।  मैंने सायकिल पे चलते हुए एक मनमोहक मदमस्त करने वाली ठंडक को महसूस किया और रोहितेश्वर मंदिर पे १०० ग्राम मूंगफली लेके खाने लगा।  बगल में फूलचंद जी सब्जी बेच रहे हैं , हालाँकि अब खरीदार वो मजदूर हैं जो शाम को मजूरी   कर के लौट चले हैं। फूलचंद जी की दुकान पे एक बहुत ही बढ़िया साइन बोर्ड लगा हुआ है " इधर से गुजरे जो नर नारी सबको सीताराम हमारी " 

ये वही मूंगफली वाले हैं जिनसे पिताजी बचपन में १०० ग्राम मूंगफली लाते थे गरम गरम ५ रुपये की, आज मैंने १२ रुपये दिए।  सबसे आनंद आता था जब मैं दो चार मूंगफलियां छिपा लिया करता था और सबके ख़त्म होने के बाद चिढ़ा के खाता था , हालाँकि माताजी फिर भी  एक दो छोटे भाई को दिला  देतीं थी।  वाह क्या नवम्बर  महीना होता था। 

मैंने अस्सी जाने का मन बनाया संकटमोचन होते हुए।  अगर आपको संकटमोचन का सही आनंद लेना है तो शाम या सुबह में आरती के समय जाइए , एकदम अलग राग में हनुमानाष्टक पढ़ते हैं और एक अलग ही माहौल होता है।  संकटमोचन जाना बनारस की अदा नहीं आदत है और मंगलवार और शनिवार तो पूरा बनारस हनुमानभक्त रहता है , लेकिन ठण्ड में नंगे पाऊँ टाइल्स पे खड़े होकर  आरती का आनंद अद्धभुत है। 

वापिस मैं अस्सी की तरफ निकल पड़ा , तुलसी घाट पे सायकिल लगाई , हनुमान जी के छोटे से मंदिर पे प्रणाम किया।  मंदिर के पीछे से ८४ घाटों का अद्धभुत दृश्य और माँ गंगा पे रौशनी का प्रतिबिम्ब , आप विश्वास नहीं करेंगे , ये लिखते हुए मेरे रौंगटे खड़े हो रहे हैं ठण्ड में ये दृश्य विहंगम होता है।  सुनसान घाटों पे दूर से जय सिया राम जय जय सिया रामा सुनायी दे रहा है और एक साधू बाबा निर्गुण गाते हुए गुजर रहे हैं " नैहरवा हमका न भावे , साईं की नगरी परम अति सुन्दर , जहाँ कोई  जाए न आवे , तपन यहाँ जिया की बुझावे , नैहरवा। .......... "

मैं कुछ देर सबकुछ भूल के वहीँ बैठ गया और  कबीर का यही निर्गुण गुनगुनाने लगा।  किसी ने सही ही कहा है 
" काशी कबहुँ न छोड़िये विश्वनाथ दरबार "

मेरी आँख खुल गयी , अलार्म में रॉक म्यूजिक बज रह था , मैं नौकरी पे जाने के लिए देर हो चूका था और अपनी जिंदगी से दूर बहत दूर काशी को कबका छोड़ चुका था। 



आपको छोड़े जा रहा हूँ उसी निर्गुण के साथ।

Tuesday, 21 October 2014

दीपावली थी

आज सुबह सुबह नौकरी पे जाने को तैयार हो रहा था की व्हाट्सप्प पे एक सन्देश आया। धनतेरस की शुभकामनाएं।  झटका लगा , आज धनतेरस है मतलब परसो दिवाली है और मैं कहाँ हूँ ?
कुछ देर के लिए सोच में पड़ गया , मुझे वो मिटटी के दीये और गणेश लक्ष्मी की दूकान दिख रही थी।  माँ की वो आवाज़ जो कह रही थी अंकुर चलो आज चांदी का सिक्का खरीदना है। वो गोदोलिआ  की रौनक जहाँ हर इंसान मस्त और एक अलग आनंद में दिख रहा था। हर तरफ एक ख़ुशी की लहर और गुलाबी ठंडक ओस भरी। मुझे वो गरम  मूंगफली याद रही थी जिसे छील के खाने का मजा ही कुछ और था।  भाई के साथ छत पे झालर लगाना और कैसे भी उस ख़राब झालर को सही करके लगा देना।  अमावस की रात में दीपवली क्या नज़ारा होता था।  दीपावली मतलब घर ,वो बेसन के लड्डू ,पटाखे और मस्ती करने की आज़ादी। 
फिर से झटका लगा , याद आया उस दिन नौकरी पे जाना है और AC में कंप्यूटर चलाना है। मैंने अँगरेज़ी में बोला व्हाट मैन।  और चल दिया पेट पालने।

दीपवली की शुभकामनाएं !!

Monday, 25 August 2014

बरसन लागी बदरिआ (लघु प्रेम कथा )

तेज बारिश हो रही थी , पर मुझे छीटें अच्छीं लग रहीं थी।  हाथ में गर्म चाय का प्याला था और कानो में इयरफोन से  गिरिजा देवी की "बरसन लगी बदरिआ रूम झूम के " सुन रहा था।  मैंने छोटू से कहा एक समोसा और दे दो भाई।   तभी भागते हुए , सर पर दुप्पट्टा ओढ़े तुम भी उस चाय के दुकान के प्लास्टिक के नीचे खड़ी हो गयी।
तुम्हारा चेहरे पे हलकी सी बारिश की छीटें फिर भी आ रहीं थीं जिसे तुम बार बार दुपट्टे से पोछ रही थी।  जिंदगी में पहली बार मैंने इतने करीब से किसी लड़की को देखा था और सोच रहा था सरलता से बढ़कर कुछ भी नहीं।  तुम्हरी वो अंजानी सी बिखरी लटें , बारिश में हलकी सी भीगी हुई , तुमहरा वो हल्का सा परेशान होना ,  भीगा हुआ चेहरा जैसे अभी अभी काली खिली हो बरसात में , सच कहूँ तो नजरें हटाये नहीं हट रहीं थीं। 

मुझे नहीं पता क्या हुआ पर मैंने पहली बार जीवन  में  किसी लड़की से पूछा चाय लेंगी ? तुमने मुझे देखा कुछ अजीब निगाहों से फिर दुपट्टे से बाल पोछने लगी।
छोटू समोसा लेके आ गया था , तुमने मुस्कुराकर कहा छोटू समोसा इधर दो और एक चाय भी। मैं  भी मुस्कुराया , चाय आई , तुमने हलके कम्पन से प्याले को थामा , एक घूँट पिया और गुनगुनाने लगी " बरसन लगी बदरिया रूम झूम के ". !!!!

Tuesday, 4 February 2014

स्वागत है ऋतुराज

पर्वतों के बीच सूर्योदय के साथ 
लहरों से तेज़ सागर के पार, 
अग्नि से उष्ण चंद्रमा से शीतल 
संगीत कि ध्वनियों के भीतर. 

आज नभ में छा गए हो 
वसुंधरा महका गए हो ,
कर रहा हर कोई तुम्हारा यशोगान 
पुलकित प्रसन्न है हर इंसान। 

प्रकृति का श्रृंगार हो तुम 
आनंद एवं उल्लास हो तुम ,
पुलकित पल्लव शाखाओ पर 
पुष्प सुगन्धित आभाओं पर 
आत्मा का परमात्मा से  
कर रहे तुम मिलन आज 
तुम ही हो ऋतुराज। 

ऋतुराज तुम अनंत हो 
कुसुमाकर और शिशिरांत हो 
हर हृदय को कर प्रफ्फुलित 
छेड़ कर वसंत राग 
स्वागत है  स्वागत है आज।  
                                                ( वसंत पंचमी पे वसंत आगमन पर )

Monday, 20 January 2014

कहाँ हैं सुकून ?

अरे पाण्डेय जी पता है आपको ,  फ़लाने ने डिमाका जगह पे 2 BHK ले लिया है , फलाना का डिमाका वीजा लग गया अब वो पैसे में खेलेगा , अभी अभी पता चला टिंकू ने स्विच मार दिया , अबे तुम्हे पता है ऊ बोकवा रजुवा भी बियाह कर लिया

कुछ दिन बाद ऐसे ही वापस मैंने फ़लाने से पूछा 2 BHK कैसा है ? जवाब आया अबे बस सोना होता है बाकी टाइम तो दफ्तर में रहतें हैं माँ बाबूजी को यहाँ आना   पसंद नहीं, कुछ अच्छा नहीं लगता अब,.

विजवा वाले से पूछा अबे दबा के कमा रहे होगे परदेस में बोला भैया कौनो सुकून नहीं है कौन कब आके गोली मार दे डर लगा रहता है , बाबूजी कि तबियत ठीक नहीं रहती लेकिन उनको देख नहीं सकते इसलिए दुखी रहते हैं.।

टिंकू से बात हुई नयी कंपनी तो मस्त होगी भाई अच्छा कमा रहे होगे काम भी बढ़िया होगा , जवाब आया अबे कौन बढ़िया, दिन रात काम है सपोर्ट का , कुछ सीखने को नहीं एक ही चीज रोज अब तो उब गया हूँ नयी खोज रहा हूँ। …

रजुवा से बात हुई बोला लड़की थोड़ी ज्यादा चालाक निकली हमपे दहेज़ का मुकदमा ठोक  दिया है , आजकल तो कचहरी के चक्कर लगे हुए हैं.।

मुझे भी चक्कर आ गया.…।  खाओ पीयो, स्वस्थ रहो मस्त रहो ( इतना आसान नहीं )