Tuesday, 21 October 2014

दीपावली थी

आज सुबह सुबह नौकरी पे जाने को तैयार हो रहा था की व्हाट्सप्प पे एक सन्देश आया। धनतेरस की शुभकामनाएं।  झटका लगा , आज धनतेरस है मतलब परसो दिवाली है और मैं कहाँ हूँ ?
कुछ देर के लिए सोच में पड़ गया , मुझे वो मिटटी के दीये और गणेश लक्ष्मी की दूकान दिख रही थी।  माँ की वो आवाज़ जो कह रही थी अंकुर चलो आज चांदी का सिक्का खरीदना है। वो गोदोलिआ  की रौनक जहाँ हर इंसान मस्त और एक अलग आनंद में दिख रहा था। हर तरफ एक ख़ुशी की लहर और गुलाबी ठंडक ओस भरी। मुझे वो गरम  मूंगफली याद रही थी जिसे छील के खाने का मजा ही कुछ और था।  भाई के साथ छत पे झालर लगाना और कैसे भी उस ख़राब झालर को सही करके लगा देना।  अमावस की रात में दीपवली क्या नज़ारा होता था।  दीपावली मतलब घर ,वो बेसन के लड्डू ,पटाखे और मस्ती करने की आज़ादी। 
फिर से झटका लगा , याद आया उस दिन नौकरी पे जाना है और AC में कंप्यूटर चलाना है। मैंने अँगरेज़ी में बोला व्हाट मैन।  और चल दिया पेट पालने।

दीपवली की शुभकामनाएं !!

4 comments:

  1. हमें भी कंप्यूटर पे मनानी पड़ेगी दिवाली लग रहा है।

    ReplyDelete
  2. Celebrate your Diwali wid your friends... Diya jarur jalana......
    Maduadih ke flyover ke niche ki sadak 1 dam achi Ho gai he.... +ve changes nazar aa rahe he.... :)

    ReplyDelete
  3. अच्छी बात है ज्योति जी

    ReplyDelete