पर्वतों के बीच सूर्योदय के साथ लहरों से तेज़ सागर के पार,
अग्नि से उष्ण चंद्रमा से शीतल
संगीत कि ध्वनियों के भीतर.
आज नभ में छा गए हो
वसुंधरा महका गए हो ,
कर रहा हर कोई तुम्हारा यशोगान
पुलकित प्रसन्न है हर इंसान।
प्रकृति का श्रृंगार हो तुम
आनंद एवं उल्लास हो तुम ,
पुलकित पल्लव शाखाओ पर
पुष्प सुगन्धित आभाओं पर
आत्मा का परमात्मा से
कर रहे तुम मिलन आज
तुम ही हो ऋतुराज।
ऋतुराज तुम अनंत हो
कुसुमाकर और शिशिरांत हो
हर हृदय को कर प्रफ्फुलित
छेड़ कर वसंत राग
स्वागत है स्वागत है आज।
( वसंत पंचमी पे वसंत आगमन पर )
No comments:
Post a Comment