Thursday, 6 November 2014

मेरी कहानी -1

अच्छा लगता था जब सब मेरी तारीफ़ करती थे , कितना अच्छा बच्चा है ,  सब टीचर सराहते थे , सबसे आगे बैठता था ( चश्मा का पावर बहुत था ) लेकिन हर किसी का कहा मानता था , मैं चम्पक के आदर्श बालक जैसा था जो भी हो बस अच्छा बने रहना है , सच्चा बालक। 

बात सातवीं कक्षा की होगी मैंने गालियां और लड़कियों के बारे में सुनना शुरू  कर दिया था , सच कहु तो कुछ समझ नहीं आता था पर दिमाग में ये था की ये सब गलत है, गन्दा है , पाप है।  सेक्स के बारे में बायो की किताब में रटा  , न टीचर ने समझाया न मैंने समझा ।  पीछे बैठने वाले लड़के हमेशा बेकार और मूर्ख समझे जाते हैं थे और रहेंगे , लेकिन अब समझ में आता है असली ज्ञान और जिंदगी का आनंद उन्होंने ही लिया है और लेते रहेंगे। उनसे ही ये ज्ञान मिला।  

ये वो कक्षा थी जब मुझे सच में गणित समझ में आना बंद हो गया था , किसी तरह रट्टा मार के शिक्षको के नजर में हीरो बना रहता था , हाँ हिंदी संस्कृत और अंग्रेजी मुझे बहुत पसंद थे और स्कूल  के पहले ही दिन मैं सारी कहानियां ख़त्म कर डालता था। 
विज्ञानं को तो  रट के किसी तरह पास किया जा सकता है गणित फिर भी कठिन है। मुझे नहीं पता मैं कैसे पास हुआ और सच कहूँ तो आज भी मुझसे उस समय की गणित के सवाल नहीं बनते। मेरा पिसना शुरू हो चुका था , लेकिन मैं फिर भी स्कूल और अपने परिवार में अच्छा बच्चा बना रहा। 

जानते हैं मुझसे गलती क्या हुई ? मैंने कभी  खुद को मना ही नहीं किया की ये मत करो।  मैंने सवाल ही नहीं पूछा खुद से या किसी शिक्षक से से की ये क्यों हो रहा है ? क्यूँ क्यूँ क्यूँ  ये शब्द मैंने बंद कर दिया था।  बस अच्छा बना रहा।  

इस बीच मेरा मंच प्रेम जाग चूका था और मेरे मंच पे होने का मुख्या कारन होता था की शिक्षक मुझे पसंद करेंगे और मैं थोड़ा हीरो भी बनूँगा। लेकिन ये अतिशयोक्ति नहीं है की गायन प्रतोयोगिता को छोड़ करके सबमे मैं प्रथम आता था और  एक समय तो ऐसा आया की बाकी बच्चे ये कहते थे की अंकुर अगर भाग ले रहे हैं तो हमारा जाना व्यर्थ है। 

१० वी कक्षा में किस्मत कुछ ठीक हुई और मुझे गणित के अच्छे अध्यापक भी मिले , सच कहूँ तो उन्होंने ही मुझमे गणित के प्रति थोड़ा प्रेम जगाया लेकिन वो गणित बहुत सरल भी थी।  इसी बीच लोगो को मुझमे अभी से एक IITian  दिखने लगा था , अड़ोस पड़ोस के सब घरों से भैया दीदी IIT पहुंच चुके थे और मैंने तो आठवीं से ही ब्रिलिएंट का करेस्पोन्डेडन्ट भी ज्वाइन कर लिया था। अब मुझे मेरा IIT में जाना भी तय लग रहा था। लेकिन अंदर की सच्चाई ये थी की मुझे कुछ भी समझ नहीं आता था बस  मैं सबको खुश कर रहा था। सब खुश भी थे। 

रट्टा मार के और खूब अभ्यास करके दसवीं में 88 % अंक ले आया।  सच कहूँ तो मैं 90 से ज्यादा ला सकता था , आये नहीं लेकिन  मैं ये सब क्यों कर रहा था मुझे नहीं पता।  और अब मेरी जिंदगी में ऐसा पड़ाव आया जिसे मैं आज तक ढो रहा हूँ।  IIT की कोचिंग , उसकी तैयारी।  बस वही सबकुछ हो गया था।  मेरा बचपन दसवीं कक्षा में मर गया और असली अंकुर भी।  मंच  भी दूर हो गया था।  बस यही पता था इज़्ज़त तो IIT जाने में ही है।  कोचिंग में चीज़ें कुछ कुछ समझ भी आतीं थी पर मुझसे सवाल नहीं बनते थे ये सच है , मैं मेहनत करता था पर मुझसे सवाल नहीं हल होते थे।  अंदर ही अंदर मैं  घुटा जा रहा था , बस इंजीनियर बनना है IIT से।  कोचिंग के टेस्ट में तो बुरा हाल था ही स्कूल में भी साख चौपट होने लगी।  लेकिन मैं आदर्श बालक की तरह लगा रहा खुद का और सबका मूर्ख बनाता रहा।  बारहवीं  में तो ये हाल हुआ की मैं गणित के एक परीक्षा में फेल  हो गया।  जीवन में आजतक मैं स्कूल में फेल नहीं हुआ था , मेरे शिक्षक ने पुछा ऐसा क्यों ? मैंने पहली बार निर्भीक होके कहा " सर पढाई नहीं की थी " उस दिन मैं शाम को कोचिंग नहीं गया पिताजी ने कहा अगर नहीं हो रहा तो छोड़ दो।  काफी देर से कहा।  मैंने भी गाँठ बाँध ली १० दिन IIT भूल के गणित पढ़ा , आप विश्वास नहीं करेंगे 90 अंक आये , लेकिन सच वही था  रट्टा और अभ्यास। मुझे समझना अच्छा लगता था और  आता भी था , पर उसे प्रयोग में नहीं ला पाता था।  मैं एक इंजीनियर कभी नहीं था न हूँ। 

जैसे तैसे बारहवीं में 77 % अंक आये , लेकिन सच तो वही था की IIT कोसों दूर , IIT PRE ही नहीं निकला वो तो   बहुत दूर की बात थी।  लेकिन किसी ने मुझसे ये नहीं कहा की BA करो हिंदी अंग्रेजी साहित्य को समझो समाज को समझो कला का आनंद लो और उसे समझो। क्यूंकि वो रोटी नहीं देगा , इंजीनियर      
का पढाई रोटी देगा काम से काम अपना पेट पाल लोगे।  हैरानी मुझे तब होती है अब जब मैं भारत या विश्व के ज्यादातर सम्मानित और प्रभावशाली लोगों को इन्ही विषयों पे पारंगत देखता हूँ और सबसे ऊँचे पदों पे भी। 


आज मैं कागज़ पे इंजीनियर हूँ और अपना पेट ही पाल रहा हूँ , मुझे खुश रहना है क्यूंकि इस देश के ज्यादातर लोगों के पास वो भी नहीं हैं। मैं कंप्यूटर चला लेता हूँ और फिर से वही अपना और दूसरों का मूर्ख ही बना रहा हूँ।  सच ये है की मैं रोज़ तिल तिल के कुढ़ता हूँ और मरता हूँ। 
इतना ही कहूँगा की अपने बच्चों को परखने का प्रयास करिये  वरना जरूर कहीं हज़ारों अंकुर आपका और अपना मूर्ख बना रहे होंगे। 

आगे भी बहुत लम्बी कहानी है , उसे अगले पन्नो में , क्यूंकि मैं  इंजीनियर की पढाई शुरू करने वाला था.....  

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