Saturday, 10 April 2021

यार बनारस , तुम फिर याद आने लगे हो !



वो तुलसी घाट की सीढ़ियों पे नीम्बू की चाय 

और पीपल के पेड़ के नीचे गंगाजी की हवाएँ 

 मेरी डूबती सी मोहब्बत और वो चिलम का  उठता धुआं 

यार बनारस , तुम फिर याद आने लगे हो !


वो बौराये से आम और गरबैठि सी बेर 

शिवरात्रि के धतूरे और पिसी हुई भांग  

वो काशी का अस्सी और रामनगर की लस्सी 

अरे हाँ बाबा की ठंडई   और हमारी लंठई 

यार बनारस , तुम फिर याद आने लगे हो !


वो मसाने की होरी और हम लखेरो की टोरी 

वो गरियाते हुए हमारा केशव का पान 

ख़त्म हो रही मलइयो और छन्नूलाल की  तान 

मुझे याद आ रही है गिरिजा की कजरी महान 


वो रात के सन्नाटे में चांदनी की आवाज़ 

और बदन पे लपेटे अघोरी  राख 

महा शमशान का वो असली  बैराग!


यार बनारस , तुम फिर याद आने लगे हो !

यार बनारस , तुम फिर याद आने लगे हो !

Tuesday, 15 December 2020

अलविदा LC Ram सर



ये वो दौर था जब मैं एक मासूम बचपने से निकल कर शैतानी और दुनियादारी के बचपने  में प्रवेश कर रहा था। जी हाँ वही सातवीं से नौवीं क्लास का समय।  हमारे सातवीं क्लास का पहला दिन और एक डायनामिक शिक्षक क्लास में आते हैं, किसी को खड़ा करते हैं पूछते हैं  क्या नाम है बच्चा ?  पिताजी का नाम ? पिताजी का पेशा ? यहाँ तक तो ठीक था एक नया सवाल आता है।  गांव कहाँ है बच्चा ? ये प्रश्न पूछना हम सबके लिए नया था।  कुछ बच्चे अपने गांव का नाम नहीं बता पाते थे।  आज तो 50 % गांव देखें ही नहीं होंगे।  लेकिन आपको अपने रूट्स से जोड़ना श्री लाल चंद राम जी का उद्देश्य था।  और यह भी जानना की आप जिस क्षेत्र से हैं वहां के संघर्ष कैसे हैं। 

सर को विशेष कर याद किया जाता है उनके डेफिनिशन  प्रेम के कारण।  वो हर चीज़ को डिफाइन करवाते थे और कहीं न कहीं  यूनिक डेफिनिशंस भी होतीं थीँ।  मुझे आज भी diffusion की डेफिनिशन जुबान पे रटी हुई है।  मूवमेंट ऑफ़ मोलेक्युल्स फ्रॉम थे रीज़न ऑफ़ हायर कंसंट्रेशन टू द रीज़न ऑफ़ लोअर कंसंट्रेशन , टिल द कंसंट्रेशन इस  equalized इस कॉल्ड diffusion. ( इग्नोर माय हिंगलिश )

समझा भी देते थे,  थोड़े स्ट्रिक्ट थे लेकिन मन के बहुत अच्छे।  उनकी एक और खास बात थी की समझते हुए एक क्लास आगे का भी पढ़ा देते थे।  इलेक्ट्रान से मेरा इंट्रोडक्शन उन्होने ही कराया और  ऑफबाऊ सिद्धान्त से भी।  मुझे बहुत मानते भी थे :-) . 

खैर हम बड़े होने लगे, इंजीनियर बनने लगे , शायद बन भी गए ,और अब शायद कहीं किसी कोने में कोहरे को देख रहा हूँ खिड़की से दुनिया से दूर। आज सर दिख रहे हैं।  वो धूमिल यादें साफ़ हो रहीं हैं।  

दोपहर में सन्देश आया कहीं से , सर नहीं रहे।  कोरोना लील गया।

 मैंने कई बार सोचा एक बार उनसे मिलूं आशीर्वाद लूँ लेकिन समय नहीं निकला या मैंने नहीं निकाला।  उन्होंने अनगिनत छात्रों को इलेक्ट्रान से और उनके गांव से परिचित कराया। ये लिखते हुए मैं थोड़ा भावुक हूँ , अब लग रहा है वो दौर आने लगा है जब अपने जाने लगे हैं। ईश्वर हमे शक्ति दे इस  दौर को समझने की और LC Ram सर  की आत्मा को शांति प्रदान करे।  


Wednesday, 19 February 2020

छूटना जरुरी है।

छूटना जरुरी है।
 उस रेल का जो देर से खड़ी है , एक ही स्टेशन पे। जिससे मैं देख रहा हूँ उन चूहों को बार बार बिल से बाहर आते और खाने के टुकड़ों को बिल में ले जाते। मैं देख सकता हूँ , उस नयी दुल्हन को जिसको छोड़ने उसका परिवार आया है , वो सुबक रही है। उसका पति मुस्कुरा रहा है। मैं देख रहा हूँ उस झाड़ू मरने वाले को जो थक गया है कूड़ा साफ़ करके क्यूंकि लोग फेकते जा रहे हैं वो साफ़ करता जा रहा है। मैं देख रहा हूँ उस बेटे को जिसे  छोड़ने उसके माँ बाप आएं है।  वो पहली बार घर छोड़ रहा है और खुश है।  माँ सुबक रही है। मैं देख रहा हूँ  छोटी बच्ची को जो बहुत खुश है , वो नानी के घर जा रही है अपनी माँ के साथ, उसके पापा चुपचाप बहार खड़े हैं। और वो साधू जिसने चिलम भरी है अभी अभी , बहुत थका है वो। और एक गेरुआ धारी जो मेरे सामने बैठे हैं अखंड राष्ट्रवाद समझाते हुए ना थकते हुए।

काश ये रेल न छूटे।
 मैं छोड़ रहा हूँ अपने सबसे खूबसूरत पल जो मुझे इस शहर ने दिए।  मेरी वो दोस्त जिसके होठों के निशान मेरे काफी मग पे बने हुए हैं , सहेजे हुए हैं।  मेरा वो रैकेट जिसने शराब का काम किया है। जब मैं उसके साथ होता हर गम भुला देता।  वो नारियल वाला जिसके पास मैं भोजपुरी के लिए जाता था। वो गार्डन जहाँ मैं घंटों विनोद कुमार शुक्ल , श्रीलाल शुक्ल और फैज़ को जीता था।  और वो रिटायर्ड अंकल जिन्होंने मुझे अनगिनत फ़िल्टर काफी पिलायीं थी।  वो कहते मैं उनकी गुजरी हुई पत्नी की तरह हूँ। और हाँ वो केक वाला जिसने मेरे जन्मदिन के लिए अपने शॉप में डिस्काउंट दिया था।  मैं तुम्हे भी छोड़ रहा था, क्योंकि अब तुम वो बकवास नहीं करती थी।  तुमने मेरे कान उमेठना छोड़ दिया था। मेरे चेहरे पे रंग लगाना छोड़ दिया था। मेरे घुंघराले बालों को तुमने सीधा करने की कोशिश छोड़ दी थी। तुम्हे मुझे छोड़ने के लिए नहीं आना चाहिए था। मैंने देख लिया था तुम रो रही थी क्यूंकि तुम ये जानती थी की तुम्हारे जाने के बाद मैं फूट फोट कर रोऊँगा।
रेल छूट ही गयी। 

Monday, 19 August 2019

ख़ामोशी

मैंने हमारे बीच हमेशा एक ख़ामोशी बना रखी।  इसी ख़ामोशी के कारण तुम मेरे पास आती थी।  वो तुम्हे कहीं और नहीं मिलती थी।  धीरे धीरे मैं और खामोश होता चला गया ताकि हमारे बीच सबकुछ सहज हो।  हम मिलते ही खामोश हो जाते थे।  सब सही हो जाता था। लेकिन , मैं जानता था , दुनिया का शोर कहाँ हमे खामोश रहने देगा। इसिलए मैंने तुम्हे एक धुन बना दिया , गुलज़ार की लिखी हुई कोई नज़्म और बर्मन का संगीत।  अब मैं हमेशा के लिए खामोश हूँ , तुम्हारी धुन है बस।  तुमने शोर चुन लिया , मैंने ख़ामोशी। 

Sunday, 7 July 2019

इतवार और पाखी

इतवार तुम एक बार फिर जा रहे हो 
इस बार तो तुमको बारिश ने भी सराबोर कर दिया 
तुम्हारी ये वाली शाम बहुत खूबसूरत थी 
मै जानता  हूँ कल भी ये शाम आएगी 
लेकिन इतवार तुम तो न होगे 

इतवार तुमको पता है 
तुम पाखी की तरह हो 
हाँ वही बारिश के बाद वाला कीड़ा 
 जिसे रौशनी पसंद होती है ,
प्रणय  के लिए 
लेकिन फिर तुम स्वतः खत्म हो जाते हो
प्रणय के बाद 

इतवार तुम खत्म  हो जाते  हो स्वतः
लेकिन सिर्फ चंद ख़ुशक़िस्मतों को 
तुम्हारा ख़त्म होने का बेहद इंतज़ार रहता है 
उन्ही चंद  ख़ुश्किमत बनने की तलाश में 
मेरा ये जीवन समर्पित है।  

Sunday, 9 June 2019

जी हां सब ठीक है

सीन 1
सुबह की ठंडी ठंडी पछुआ हवा, स्टेशन के मुख्य द्वार पे दुनिया से बेखौफ मीठे मीठे सपनों में 5-6 बच्चे यही कोई 5-7 साल के। वाह क्या मजा आता है सुबह की नींद का और ऐसी ठंडी हवा का जून में। हज़ारों की तादात में गुजरते इंसान लेकिन ये बच्चे, उनके शोर से दूर अपनी दुनिया में झूला झूलते टॉफी खाते जमीन पे बेखौफ बहुत ही सुंदर लग रहे हैं। स्टेशन पे एक बहुत बड़ा पंखा लगा है, सबको लगता है सिर्फ लगता है वो हवा दे रहा है, इन बच्चों को भी। अब्दुल अपनी गाड़ी पे गोल गोल घूम रहा है उसके पैर नहीं है , बीच मे आवाज़ भी लगा रहा है उठ जाओ उठ जाओ, लेकिन ये तो अपनी ज़िंदगी के चंद सबसे खूबसूरत पलों में हैं, कहाँ उठने वाले! आस पास बैठे लोग भी नींद में झुल्ली मार ले रहे हैं।

सीन 2

मेस्सी और रोनाल्डो (दो सफाई कर्मचारी )प्रकट होते हैं एक चमकदार नारंगी जैकेट पहन के। उम्र होगी यही कोई 14-15 साल, और जिनकी  आत्मा से लेकर शरीर, सब बादशाह और हनी सिंह के नाम है । भोसड़ी के उठ! उठ रे भोसड़ी! बेहद खूबसूरत 5-6 किक। ऐलिस अपने वंडरलैंड से जमाई लेते हुए मेस्सी और रोनाल्डो का दर्शन करती हैं। तभी दनादन एक दो गोल का और प्रयास, सब के सब स्वच्छ भारत मिशन के इन देवदूतों का दर्शन करते हैं। अब्दुल अब अपनी गाड़ी ठक ठक बजाने लगा है, उठ जो रे उठ! आ गईल गड़िया उठ! ऐलिस अभी भी वंडरलैंड के झूलों में झूल रही है और ये क्या आसमान से बरसात, जी हां स्टेशन के अंदर, सर्फ का पानी बोतल में और उसकी बरसात सिंदबाद जहाजियों पे। सब के सब कलियुग में वापिस, उठ के भाग रहे हैं, स्वच्छ भारत का बाहुबली आ गया है अपनी गाड़ी पे सवार, सबकुछ रौंद के पोछ डालेगा, चमका देगा दूध सी सफेदी से पूरी कायनात को। मेस्सी और रोनाल्डो अब पेनल्टी शूटआउट कर रहे हैं और एक एक करके गोल हो रहा है। ऐलिस उठ गई है और शायद फिर से दूसरे वंडरलैंड के लिए चल दी है। आस पास के लोग अब भी झुल्ली मार रहे हैं। मैं कविश का निंदिया सुन रहा हूँ।

Thursday, 9 May 2019

जाऊँगा वहाँ



जाऊँगा वहाँ 
बस जाऊँगा वहीं 

और यहाँ 
किसी के  कंप्यूटर  या मोबाइल पे 
वॉलपेपर बन के रह जाऊँगा 

मेरा नाम  पड़ा रहेगा 
सिनेमा के उन दो टिकटों पे 
जो मैंने कार्नर में  लिए थे 

और  मेरी गंध रहेगी तुम्हे दी हुई 
पुरानी  किताबों में उस मोरपंख के साथ

 क्या पता मुझे याद करेगा वो साधू 
मणिकर्णिका पे चिलम सुलगाते हुए 
जिससे तुम दूर भागती थी 

या मेरी आवाज़ें सुनाई देंगी 
जब भी हवाएं गुज़रेंगी पीपल के उस पेड़ से 
जिसके नीचे गंगा के सामने हमने कसमें खायीं थीं 

शायद सिमट जाऊँगा उन दीयों की रौशनी में 
जो तुमने ऑंखें बंद कर प्रवाहित किये मेरे लिए 
और उड़ जाऊँगा उन कबूतरों के साथ गंगा के उस पार 
बस जाऊँगा वहीँ रह जाऊँगा वहीँ ||