Sunday, 7 July 2019

इतवार और पाखी

इतवार तुम एक बार फिर जा रहे हो 
इस बार तो तुमको बारिश ने भी सराबोर कर दिया 
तुम्हारी ये वाली शाम बहुत खूबसूरत थी 
मै जानता  हूँ कल भी ये शाम आएगी 
लेकिन इतवार तुम तो न होगे 

इतवार तुमको पता है 
तुम पाखी की तरह हो 
हाँ वही बारिश के बाद वाला कीड़ा 
 जिसे रौशनी पसंद होती है ,
प्रणय  के लिए 
लेकिन फिर तुम स्वतः खत्म हो जाते हो
प्रणय के बाद 

इतवार तुम खत्म  हो जाते  हो स्वतः
लेकिन सिर्फ चंद ख़ुशक़िस्मतों को 
तुम्हारा ख़त्म होने का बेहद इंतज़ार रहता है 
उन्ही चंद  ख़ुश्किमत बनने की तलाश में 
मेरा ये जीवन समर्पित है।  

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