छूटना जरुरी है।
उस रेल का जो देर से खड़ी है , एक ही स्टेशन पे। जिससे मैं देख रहा हूँ उन चूहों को बार बार बिल से बाहर आते और खाने के टुकड़ों को बिल में ले जाते। मैं देख सकता हूँ , उस नयी दुल्हन को जिसको छोड़ने उसका परिवार आया है , वो सुबक रही है। उसका पति मुस्कुरा रहा है। मैं देख रहा हूँ उस झाड़ू मरने वाले को जो थक गया है कूड़ा साफ़ करके क्यूंकि लोग फेकते जा रहे हैं वो साफ़ करता जा रहा है। मैं देख रहा हूँ उस बेटे को जिसे छोड़ने उसके माँ बाप आएं है। वो पहली बार घर छोड़ रहा है और खुश है। माँ सुबक रही है। मैं देख रहा हूँ छोटी बच्ची को जो बहुत खुश है , वो नानी के घर जा रही है अपनी माँ के साथ, उसके पापा चुपचाप बहार खड़े हैं। और वो साधू जिसने चिलम भरी है अभी अभी , बहुत थका है वो। और एक गेरुआ धारी जो मेरे सामने बैठे हैं अखंड राष्ट्रवाद समझाते हुए ना थकते हुए।
काश ये रेल न छूटे।
मैं छोड़ रहा हूँ अपने सबसे खूबसूरत पल जो मुझे इस शहर ने दिए। मेरी वो दोस्त जिसके होठों के निशान मेरे काफी मग पे बने हुए हैं , सहेजे हुए हैं। मेरा वो रैकेट जिसने शराब का काम किया है। जब मैं उसके साथ होता हर गम भुला देता। वो नारियल वाला जिसके पास मैं भोजपुरी के लिए जाता था। वो गार्डन जहाँ मैं घंटों विनोद कुमार शुक्ल , श्रीलाल शुक्ल और फैज़ को जीता था। और वो रिटायर्ड अंकल जिन्होंने मुझे अनगिनत फ़िल्टर काफी पिलायीं थी। वो कहते मैं उनकी गुजरी हुई पत्नी की तरह हूँ। और हाँ वो केक वाला जिसने मेरे जन्मदिन के लिए अपने शॉप में डिस्काउंट दिया था। मैं तुम्हे भी छोड़ रहा था, क्योंकि अब तुम वो बकवास नहीं करती थी। तुमने मेरे कान उमेठना छोड़ दिया था। मेरे चेहरे पे रंग लगाना छोड़ दिया था। मेरे घुंघराले बालों को तुमने सीधा करने की कोशिश छोड़ दी थी। तुम्हे मुझे छोड़ने के लिए नहीं आना चाहिए था। मैंने देख लिया था तुम रो रही थी क्यूंकि तुम ये जानती थी की तुम्हारे जाने के बाद मैं फूट फोट कर रोऊँगा।
रेल छूट ही गयी।
उस रेल का जो देर से खड़ी है , एक ही स्टेशन पे। जिससे मैं देख रहा हूँ उन चूहों को बार बार बिल से बाहर आते और खाने के टुकड़ों को बिल में ले जाते। मैं देख सकता हूँ , उस नयी दुल्हन को जिसको छोड़ने उसका परिवार आया है , वो सुबक रही है। उसका पति मुस्कुरा रहा है। मैं देख रहा हूँ उस झाड़ू मरने वाले को जो थक गया है कूड़ा साफ़ करके क्यूंकि लोग फेकते जा रहे हैं वो साफ़ करता जा रहा है। मैं देख रहा हूँ उस बेटे को जिसे छोड़ने उसके माँ बाप आएं है। वो पहली बार घर छोड़ रहा है और खुश है। माँ सुबक रही है। मैं देख रहा हूँ छोटी बच्ची को जो बहुत खुश है , वो नानी के घर जा रही है अपनी माँ के साथ, उसके पापा चुपचाप बहार खड़े हैं। और वो साधू जिसने चिलम भरी है अभी अभी , बहुत थका है वो। और एक गेरुआ धारी जो मेरे सामने बैठे हैं अखंड राष्ट्रवाद समझाते हुए ना थकते हुए।
काश ये रेल न छूटे।
मैं छोड़ रहा हूँ अपने सबसे खूबसूरत पल जो मुझे इस शहर ने दिए। मेरी वो दोस्त जिसके होठों के निशान मेरे काफी मग पे बने हुए हैं , सहेजे हुए हैं। मेरा वो रैकेट जिसने शराब का काम किया है। जब मैं उसके साथ होता हर गम भुला देता। वो नारियल वाला जिसके पास मैं भोजपुरी के लिए जाता था। वो गार्डन जहाँ मैं घंटों विनोद कुमार शुक्ल , श्रीलाल शुक्ल और फैज़ को जीता था। और वो रिटायर्ड अंकल जिन्होंने मुझे अनगिनत फ़िल्टर काफी पिलायीं थी। वो कहते मैं उनकी गुजरी हुई पत्नी की तरह हूँ। और हाँ वो केक वाला जिसने मेरे जन्मदिन के लिए अपने शॉप में डिस्काउंट दिया था। मैं तुम्हे भी छोड़ रहा था, क्योंकि अब तुम वो बकवास नहीं करती थी। तुमने मेरे कान उमेठना छोड़ दिया था। मेरे चेहरे पे रंग लगाना छोड़ दिया था। मेरे घुंघराले बालों को तुमने सीधा करने की कोशिश छोड़ दी थी। तुम्हे मुझे छोड़ने के लिए नहीं आना चाहिए था। मैंने देख लिया था तुम रो रही थी क्यूंकि तुम ये जानती थी की तुम्हारे जाने के बाद मैं फूट फोट कर रोऊँगा।
रेल छूट ही गयी।
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