ये वो दौर था जब मैं एक मासूम बचपने से निकल कर शैतानी और दुनियादारी के बचपने में प्रवेश कर रहा था। जी हाँ वही सातवीं से नौवीं क्लास का समय। हमारे सातवीं क्लास का पहला दिन और एक डायनामिक शिक्षक क्लास में आते हैं, किसी को खड़ा करते हैं पूछते हैं क्या नाम है बच्चा ? पिताजी का नाम ? पिताजी का पेशा ? यहाँ तक तो ठीक था एक नया सवाल आता है। गांव कहाँ है बच्चा ? ये प्रश्न पूछना हम सबके लिए नया था। कुछ बच्चे अपने गांव का नाम नहीं बता पाते थे। आज तो 50 % गांव देखें ही नहीं होंगे। लेकिन आपको अपने रूट्स से जोड़ना श्री लाल चंद राम जी का उद्देश्य था। और यह भी जानना की आप जिस क्षेत्र से हैं वहां के संघर्ष कैसे हैं।
समझा भी देते थे, थोड़े स्ट्रिक्ट थे लेकिन मन के बहुत अच्छे। उनकी एक और खास बात थी की समझते हुए एक क्लास आगे का भी पढ़ा देते थे। इलेक्ट्रान से मेरा इंट्रोडक्शन उन्होने ही कराया और ऑफबाऊ सिद्धान्त से भी। मुझे बहुत मानते भी थे :-) .
खैर हम बड़े होने लगे, इंजीनियर बनने लगे , शायद बन भी गए ,और अब शायद कहीं किसी कोने में कोहरे को देख रहा हूँ खिड़की से दुनिया से दूर। आज सर दिख रहे हैं। वो धूमिल यादें साफ़ हो रहीं हैं।
दोपहर में सन्देश आया कहीं से , सर नहीं रहे। कोरोना लील गया।
मैंने कई बार सोचा एक बार उनसे मिलूं आशीर्वाद लूँ लेकिन समय नहीं निकला या मैंने नहीं निकाला। उन्होंने अनगिनत छात्रों को इलेक्ट्रान से और उनके गांव से परिचित कराया। ये लिखते हुए मैं थोड़ा भावुक हूँ , अब लग रहा है वो दौर आने लगा है जब अपने जाने लगे हैं। ईश्वर हमे शक्ति दे इस दौर को समझने की और LC Ram सर की आत्मा को शांति प्रदान करे।

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