Sunday, 3 September 2023

तुम और मैं - १

 तुम्हारे पास जब मैं पहली बार आया 

मैंने सोचा 

दुनिया को तुम्हारे  जैसे 

चन्दन सा महकता होना चाहिए 


पहली बार तुम्हारे हाथों को छुआ 

महसूस हुआ की 

 दुनिया को ऐसे ही नाजुक और गर्म होना चाहिए 


पहली बार जब आलिंगन किया 

पाया की 

दुनिया को ऐसे ही पिघलते रहना चाहिए 


आखिरी बार जब तुमने देखा 

महसूस किया की 

ख़त्म हो जाना चाहिए इस दुनिया को 

मेरे आँसुंओं के सैलाब में 

Wednesday, 29 December 2021

ये गम का साल है

 मैं अपने दिल को तसल्ली नहीं देना चाहता। ये दर्द से भरा साल है।  हम सब ने अपने खोये हैं।  बहुतों ने पुराने साथी और आने वाले साथी भी।  मुझे बहुत कुछ सिखा गया २०२१।  मुझे कुछ रिश्तों की अहमियत सिखाया और खोना चुनना सिखा गया।  मै  कहीं नहीं पहुंचना चाहता हूँ लेकिन मुझे समय दौड़ा रहा है और मैं  रुक नहीं रहा।  मैं पूरी कोशिश कर रहा हूँ प्रतीक कुहाड़  के गाने जैसा होना  लेकिन अमित त्रिवेदी के पीछे भाग रहा हूँ।  देखते हैं २०२२ जिसमे मुझे सिर्फ चुनौतियां दिख रहीं हैं मुझे क्या बनाता है।  उम्मीद है मैं खोना सीख लूंगा और फिर कुछ जीत के बाज़ीगर बनूँगा :-)

आने वाला साल मुबारक हो आप सबको !

Saturday, 13 November 2021

दिल्ली सर्दी और तुम

 



तुम्हे याद है रब्बी का वो गीत 

दिल्ली की सड़कों पे बुलेट चलाते सुनते 

मिलते थे हम पुराने किले के पीछे 

सर्दियों में मूंगफली खाते और गिलहरियों को खिलाते 


याद है तुम्हे CP के उस पार्क में मेरा गिटार 

और कॉलेज के उन लड़कों का गाना 

 सर्दी की वो सारी दोपहरें मेरी बाहों में बिताना 

और शाम होते ही रीगल में सिनेमा देखकर 

आखिरी मेट्रो से घर जाना 


याद होगा तुम्हे हमारा पहला आलिंगन 

२५ दिसबर के  वो घने कोहरे में 

जिसने छुपा लिया था मेरे माथे की  पसीने की बूँदें को 

और सिहरा दिया था हमारे शरीरों को 


हौज़ ख़ास में हमारा घंटो जॉन मेयर को सुनना 

और तुम्हारा सिगरेट के हर कश के साथ 

डूब जाना शिवानी, इस्मत और अरुंधति की दुनिया में 

जहाँ तुम और भी खूबसूरत दिखती थी धुंध छटने के बाद 


अगर तुम पढ़ रही होगी इसे आज 

तो दिल्ली सर्दी  में अब नहीं है आज़ाद 

न ले सकोगे तुम सांस और जी सकोगी वो दुनिया 

नहीं भीग सकोगे इस काली धुंध में 

जहाँ न मेरी महक है न मौजूदगी न अहसास 


Thursday, 4 November 2021

हैप्पी दीपावली

 बहुत दिनों से कुछ लिखा नहीं था, मेरा मतलब है यहाँ नहीं लिखा था, वरना टेक्निकल पेपर लिखने का प्रयास करता रहता हूँ असफलताओं के साथ। तो आज दीपावली है, जो इसे मनाते हैं प्रयास करते हैं की आज परिवार के साथ हों कुछ अच्छा समय बिताएं। जैसे दुनिया के लिए क्रिसमस है हमारे लिए दीपावली है।  शाम के साढ़े छह बज रहे हैं, मैं दुनिया से कोसों दूर एक कंप्यूटर की स्क्रीन को देख रहा हूँ , बाहर  रौशनी दिख रही है और पटाखों की आवाज़ आ रही है।  लेकिन ये सब बाहर हो रहा है।  मैं अपने परिवार से दूर एक कंप्यूटर स्क्रीन देख रहा हूँ, ऐसा करने से मेरे डिग्री लेने के संभावनाओं में इज़ाफ़ा हो रहा है।  कोरोना की क्रूरताओं के कारण ऐसा आदेश है की हम अपने परिवार से नहीं मिल सकते, यदि मिले तो एक साल के लिए इस कंप्यूटर स्क्रीन से दूर कर दिए जायेंगे।  प्रतिष्ठित संसथान हैं वो भावनाये नहीं देख सकते, उनकी अपनी मजबूरियां हैं।  खैर उनसे कोई शिकायत भी नहीं।  लेकिन बात यह है की मेरे अंदर क्या चल  रहा है।  १५ साल से घर छोड़ के दौड़ रहा हूँ , कुछ कुछ करने के लिए।  जल्दी ही ऊबने लगता हूँ , इसका मतलब है मन की नहीं कर रहा।  देखिये कब तक ऐसे ही चलेगा , शायद अंत तक।  सुबह से पीं पीं करने वाले व्हाट्सएप सन्देश अब शांत हो गएँ हैं। सब माँ लक्ष्मी का ध्यान कर रहे हैं।  मैं भी कंप्यूटर स्क्रीन पे ध्यान लगाता हूँ।  २०२१ दीपवाली मुबारक सभी को जो मेरे जैसे कंप्यूटर स्क्रीन पर बैठे हुए हैं। 


Saturday, 10 April 2021

यार बनारस , तुम फिर याद आने लगे हो !



वो तुलसी घाट की सीढ़ियों पे नीम्बू की चाय 

और पीपल के पेड़ के नीचे गंगाजी की हवाएँ 

 मेरी डूबती सी मोहब्बत और वो चिलम का  उठता धुआं 

यार बनारस , तुम फिर याद आने लगे हो !


वो बौराये से आम और गरबैठि सी बेर 

शिवरात्रि के धतूरे और पिसी हुई भांग  

वो काशी का अस्सी और रामनगर की लस्सी 

अरे हाँ बाबा की ठंडई   और हमारी लंठई 

यार बनारस , तुम फिर याद आने लगे हो !


वो मसाने की होरी और हम लखेरो की टोरी 

वो गरियाते हुए हमारा केशव का पान 

ख़त्म हो रही मलइयो और छन्नूलाल की  तान 

मुझे याद आ रही है गिरिजा की कजरी महान 


वो रात के सन्नाटे में चांदनी की आवाज़ 

और बदन पे लपेटे अघोरी  राख 

महा शमशान का वो असली  बैराग!


यार बनारस , तुम फिर याद आने लगे हो !

यार बनारस , तुम फिर याद आने लगे हो !

Tuesday, 15 December 2020

अलविदा LC Ram सर



ये वो दौर था जब मैं एक मासूम बचपने से निकल कर शैतानी और दुनियादारी के बचपने  में प्रवेश कर रहा था। जी हाँ वही सातवीं से नौवीं क्लास का समय।  हमारे सातवीं क्लास का पहला दिन और एक डायनामिक शिक्षक क्लास में आते हैं, किसी को खड़ा करते हैं पूछते हैं  क्या नाम है बच्चा ?  पिताजी का नाम ? पिताजी का पेशा ? यहाँ तक तो ठीक था एक नया सवाल आता है।  गांव कहाँ है बच्चा ? ये प्रश्न पूछना हम सबके लिए नया था।  कुछ बच्चे अपने गांव का नाम नहीं बता पाते थे।  आज तो 50 % गांव देखें ही नहीं होंगे।  लेकिन आपको अपने रूट्स से जोड़ना श्री लाल चंद राम जी का उद्देश्य था।  और यह भी जानना की आप जिस क्षेत्र से हैं वहां के संघर्ष कैसे हैं। 

सर को विशेष कर याद किया जाता है उनके डेफिनिशन  प्रेम के कारण।  वो हर चीज़ को डिफाइन करवाते थे और कहीं न कहीं  यूनिक डेफिनिशंस भी होतीं थीँ।  मुझे आज भी diffusion की डेफिनिशन जुबान पे रटी हुई है।  मूवमेंट ऑफ़ मोलेक्युल्स फ्रॉम थे रीज़न ऑफ़ हायर कंसंट्रेशन टू द रीज़न ऑफ़ लोअर कंसंट्रेशन , टिल द कंसंट्रेशन इस  equalized इस कॉल्ड diffusion. ( इग्नोर माय हिंगलिश )

समझा भी देते थे,  थोड़े स्ट्रिक्ट थे लेकिन मन के बहुत अच्छे।  उनकी एक और खास बात थी की समझते हुए एक क्लास आगे का भी पढ़ा देते थे।  इलेक्ट्रान से मेरा इंट्रोडक्शन उन्होने ही कराया और  ऑफबाऊ सिद्धान्त से भी।  मुझे बहुत मानते भी थे :-) . 

खैर हम बड़े होने लगे, इंजीनियर बनने लगे , शायद बन भी गए ,और अब शायद कहीं किसी कोने में कोहरे को देख रहा हूँ खिड़की से दुनिया से दूर। आज सर दिख रहे हैं।  वो धूमिल यादें साफ़ हो रहीं हैं।  

दोपहर में सन्देश आया कहीं से , सर नहीं रहे।  कोरोना लील गया।

 मैंने कई बार सोचा एक बार उनसे मिलूं आशीर्वाद लूँ लेकिन समय नहीं निकला या मैंने नहीं निकाला।  उन्होंने अनगिनत छात्रों को इलेक्ट्रान से और उनके गांव से परिचित कराया। ये लिखते हुए मैं थोड़ा भावुक हूँ , अब लग रहा है वो दौर आने लगा है जब अपने जाने लगे हैं। ईश्वर हमे शक्ति दे इस  दौर को समझने की और LC Ram सर  की आत्मा को शांति प्रदान करे।  


Wednesday, 19 February 2020

छूटना जरुरी है।

छूटना जरुरी है।
 उस रेल का जो देर से खड़ी है , एक ही स्टेशन पे। जिससे मैं देख रहा हूँ उन चूहों को बार बार बिल से बाहर आते और खाने के टुकड़ों को बिल में ले जाते। मैं देख सकता हूँ , उस नयी दुल्हन को जिसको छोड़ने उसका परिवार आया है , वो सुबक रही है। उसका पति मुस्कुरा रहा है। मैं देख रहा हूँ उस झाड़ू मरने वाले को जो थक गया है कूड़ा साफ़ करके क्यूंकि लोग फेकते जा रहे हैं वो साफ़ करता जा रहा है। मैं देख रहा हूँ उस बेटे को जिसे  छोड़ने उसके माँ बाप आएं है।  वो पहली बार घर छोड़ रहा है और खुश है।  माँ सुबक रही है। मैं देख रहा हूँ  छोटी बच्ची को जो बहुत खुश है , वो नानी के घर जा रही है अपनी माँ के साथ, उसके पापा चुपचाप बहार खड़े हैं। और वो साधू जिसने चिलम भरी है अभी अभी , बहुत थका है वो। और एक गेरुआ धारी जो मेरे सामने बैठे हैं अखंड राष्ट्रवाद समझाते हुए ना थकते हुए।

काश ये रेल न छूटे।
 मैं छोड़ रहा हूँ अपने सबसे खूबसूरत पल जो मुझे इस शहर ने दिए।  मेरी वो दोस्त जिसके होठों के निशान मेरे काफी मग पे बने हुए हैं , सहेजे हुए हैं।  मेरा वो रैकेट जिसने शराब का काम किया है। जब मैं उसके साथ होता हर गम भुला देता।  वो नारियल वाला जिसके पास मैं भोजपुरी के लिए जाता था। वो गार्डन जहाँ मैं घंटों विनोद कुमार शुक्ल , श्रीलाल शुक्ल और फैज़ को जीता था।  और वो रिटायर्ड अंकल जिन्होंने मुझे अनगिनत फ़िल्टर काफी पिलायीं थी।  वो कहते मैं उनकी गुजरी हुई पत्नी की तरह हूँ। और हाँ वो केक वाला जिसने मेरे जन्मदिन के लिए अपने शॉप में डिस्काउंट दिया था।  मैं तुम्हे भी छोड़ रहा था, क्योंकि अब तुम वो बकवास नहीं करती थी।  तुमने मेरे कान उमेठना छोड़ दिया था। मेरे चेहरे पे रंग लगाना छोड़ दिया था। मेरे घुंघराले बालों को तुमने सीधा करने की कोशिश छोड़ दी थी। तुम्हे मुझे छोड़ने के लिए नहीं आना चाहिए था। मैंने देख लिया था तुम रो रही थी क्यूंकि तुम ये जानती थी की तुम्हारे जाने के बाद मैं फूट फोट कर रोऊँगा।
रेल छूट ही गयी।