Monday, 19 August 2019

ख़ामोशी

मैंने हमारे बीच हमेशा एक ख़ामोशी बना रखी।  इसी ख़ामोशी के कारण तुम मेरे पास आती थी।  वो तुम्हे कहीं और नहीं मिलती थी।  धीरे धीरे मैं और खामोश होता चला गया ताकि हमारे बीच सबकुछ सहज हो।  हम मिलते ही खामोश हो जाते थे।  सब सही हो जाता था। लेकिन , मैं जानता था , दुनिया का शोर कहाँ हमे खामोश रहने देगा। इसिलए मैंने तुम्हे एक धुन बना दिया , गुलज़ार की लिखी हुई कोई नज़्म और बर्मन का संगीत।  अब मैं हमेशा के लिए खामोश हूँ , तुम्हारी धुन है बस।  तुमने शोर चुन लिया , मैंने ख़ामोशी। 

Sunday, 7 July 2019

इतवार और पाखी

इतवार तुम एक बार फिर जा रहे हो 
इस बार तो तुमको बारिश ने भी सराबोर कर दिया 
तुम्हारी ये वाली शाम बहुत खूबसूरत थी 
मै जानता  हूँ कल भी ये शाम आएगी 
लेकिन इतवार तुम तो न होगे 

इतवार तुमको पता है 
तुम पाखी की तरह हो 
हाँ वही बारिश के बाद वाला कीड़ा 
 जिसे रौशनी पसंद होती है ,
प्रणय  के लिए 
लेकिन फिर तुम स्वतः खत्म हो जाते हो
प्रणय के बाद 

इतवार तुम खत्म  हो जाते  हो स्वतः
लेकिन सिर्फ चंद ख़ुशक़िस्मतों को 
तुम्हारा ख़त्म होने का बेहद इंतज़ार रहता है 
उन्ही चंद  ख़ुश्किमत बनने की तलाश में 
मेरा ये जीवन समर्पित है।  

Sunday, 9 June 2019

जी हां सब ठीक है

सीन 1
सुबह की ठंडी ठंडी पछुआ हवा, स्टेशन के मुख्य द्वार पे दुनिया से बेखौफ मीठे मीठे सपनों में 5-6 बच्चे यही कोई 5-7 साल के। वाह क्या मजा आता है सुबह की नींद का और ऐसी ठंडी हवा का जून में। हज़ारों की तादात में गुजरते इंसान लेकिन ये बच्चे, उनके शोर से दूर अपनी दुनिया में झूला झूलते टॉफी खाते जमीन पे बेखौफ बहुत ही सुंदर लग रहे हैं। स्टेशन पे एक बहुत बड़ा पंखा लगा है, सबको लगता है सिर्फ लगता है वो हवा दे रहा है, इन बच्चों को भी। अब्दुल अपनी गाड़ी पे गोल गोल घूम रहा है उसके पैर नहीं है , बीच मे आवाज़ भी लगा रहा है उठ जाओ उठ जाओ, लेकिन ये तो अपनी ज़िंदगी के चंद सबसे खूबसूरत पलों में हैं, कहाँ उठने वाले! आस पास बैठे लोग भी नींद में झुल्ली मार ले रहे हैं।

सीन 2

मेस्सी और रोनाल्डो (दो सफाई कर्मचारी )प्रकट होते हैं एक चमकदार नारंगी जैकेट पहन के। उम्र होगी यही कोई 14-15 साल, और जिनकी  आत्मा से लेकर शरीर, सब बादशाह और हनी सिंह के नाम है । भोसड़ी के उठ! उठ रे भोसड़ी! बेहद खूबसूरत 5-6 किक। ऐलिस अपने वंडरलैंड से जमाई लेते हुए मेस्सी और रोनाल्डो का दर्शन करती हैं। तभी दनादन एक दो गोल का और प्रयास, सब के सब स्वच्छ भारत मिशन के इन देवदूतों का दर्शन करते हैं। अब्दुल अब अपनी गाड़ी ठक ठक बजाने लगा है, उठ जो रे उठ! आ गईल गड़िया उठ! ऐलिस अभी भी वंडरलैंड के झूलों में झूल रही है और ये क्या आसमान से बरसात, जी हां स्टेशन के अंदर, सर्फ का पानी बोतल में और उसकी बरसात सिंदबाद जहाजियों पे। सब के सब कलियुग में वापिस, उठ के भाग रहे हैं, स्वच्छ भारत का बाहुबली आ गया है अपनी गाड़ी पे सवार, सबकुछ रौंद के पोछ डालेगा, चमका देगा दूध सी सफेदी से पूरी कायनात को। मेस्सी और रोनाल्डो अब पेनल्टी शूटआउट कर रहे हैं और एक एक करके गोल हो रहा है। ऐलिस उठ गई है और शायद फिर से दूसरे वंडरलैंड के लिए चल दी है। आस पास के लोग अब भी झुल्ली मार रहे हैं। मैं कविश का निंदिया सुन रहा हूँ।

Thursday, 9 May 2019

जाऊँगा वहाँ



जाऊँगा वहाँ 
बस जाऊँगा वहीं 

और यहाँ 
किसी के  कंप्यूटर  या मोबाइल पे 
वॉलपेपर बन के रह जाऊँगा 

मेरा नाम  पड़ा रहेगा 
सिनेमा के उन दो टिकटों पे 
जो मैंने कार्नर में  लिए थे 

और  मेरी गंध रहेगी तुम्हे दी हुई 
पुरानी  किताबों में उस मोरपंख के साथ

 क्या पता मुझे याद करेगा वो साधू 
मणिकर्णिका पे चिलम सुलगाते हुए 
जिससे तुम दूर भागती थी 

या मेरी आवाज़ें सुनाई देंगी 
जब भी हवाएं गुज़रेंगी पीपल के उस पेड़ से 
जिसके नीचे गंगा के सामने हमने कसमें खायीं थीं 

शायद सिमट जाऊँगा उन दीयों की रौशनी में 
जो तुमने ऑंखें बंद कर प्रवाहित किये मेरे लिए 
और उड़ जाऊँगा उन कबूतरों के साथ गंगा के उस पार 
बस जाऊँगा वहीँ रह जाऊँगा वहीँ || 








Tuesday, 19 February 2019

मेरा वो मार्च

क्या तुम्हें याद है?
मार्च में जब आखिरी परीक्षा 
खत्म होती थी,
हम महसूस करते थे
वो अद्धभुत दोपहर
जिसमे हम सपने बुनते थे
मम्मी के सो जाने पर
नागराज और ध्रुव के
महकते थे मंजर आम के
और वीडियो गेम की कैसेट
किराये पे आ जाती थी
खेलने और सिर्फ खेलने का 
लाइसेंस था वो मार्च
फागुन की वो हवा
मेरे सबसे खूबसूरत यादों में है
क्योंकि मिल जाता था मुझे मेरा हेडफोन
जिसमे सुना करता था मैं लकी अली को
दिन रात सुबह शाम 
जब तक प्लेयर की बैटरी चलती थी
शाम को ज़िन्दगी बस अलादीन और स्पाइडर मैन थी
और हर सुबह मेरी स्टार गीत माला 
मेरी साईकल और दोस्तों के घर
जाग जाते थे हमारे तेंदुलकर और मैकग्राथ
बाजियां समोसे जलेबी की हर मैच पे
न कोई चिंता न उम्मीद
फागुन की हवा और आम के मंजर
बचपन का वो मार्च 
बहुत याद आता है।