Saturday, 30 December 2017

मैं बनारसी हूँ लेकिन







हाँ मैं तुम्हारे पास आना चाहता हूँ

लेकिन तुम्हारी हवा में
सांस लेने से डर  लगने लगा है |  

शोर के बाज़ार में घंटों जाम 
सुकून से दूर हर तरफ सिर्फ दूकान ही दूकान। 
अस्सी से दूर जाती माँ गंगा 
और उनमे शौच करते लोग |

घाटों के किनारे धोबी और साबुन के झाग 
बदबू मारते शौच  और पेशाब की महक 
गलियों और सडकों पे अनगिनत गोवंश 
कूड़े के ढेर में प्लास्टिक खाती गायें 
माँ गंगा आरती में लूटते हुए पंडे 
और BHU में घूमते हुए गुंडे 
ना नौकरी सिर्फ भौकाल 
कोचिंग सेंटरों का मायाजाल 

लेकिन मैं आना चाहता हूँ फिर भी 

क्यूंकि गुड़्डू की चाय नहीं बदली है 
ना ही वो पतंग गली और महाशमशान
कचौड़ी -जलेबी -लौंगलता और मलइयो यहीं पर हैं  
और केदार घाट का सूर्योदय तुम्हारा अभिमान है 
ठंडाई अभी भी प्रसाद और महादेव का निवास है
काल भैरव कोतवाल और संकटमोचन हनुमान हैं 

कबीरी फकीरी तुम्हारी फ़िज़ा में बरक़रार है  
अरे , मेरी जन्मभूमि तुम ही तो हो बनारस। 









8 comments:

  1. कबीरी फकीरी तुम्हारी फ़िज़ा में बरक़रार है
    अरे , मेरी जन्मभूमि तुम ही तो हो बनारस।
    अपनी माटी का आकर्षण कभी कम नहीं होता, खींच ही लेती है उसकी आबो हवा

    बहुत मर्मस्पर्शी रचना

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    1. बहुत बहुत धन्यवाद। आपने पढ़ा और अच्छा लगा। नव वर्ष की शुभकामनायें

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  2. नववर्ष की हार्दिक शुभकामनाएं

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  3. man ki fizaon me umarta banaras
    yaadon ki dhun pe thirakta banaras....

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  4. This comment has been removed by a blog administrator.

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