हाँ मैं तुम्हारे पास आना चाहता हूँ
लेकिन तुम्हारी हवा में
सांस लेने से डर लगने लगा है |
शोर के बाज़ार में घंटों जाम
सुकून से दूर हर तरफ सिर्फ दूकान ही दूकान।
अस्सी से दूर जाती माँ गंगा
और उनमे शौच करते लोग |
घाटों के किनारे धोबी और साबुन के झाग
बदबू मारते शौच और पेशाब की महक
गलियों और सडकों पे अनगिनत गोवंश
कूड़े के ढेर में प्लास्टिक खाती गायें
माँ गंगा आरती में लूटते हुए पंडे
और BHU में घूमते हुए गुंडे
ना नौकरी सिर्फ भौकाल
कोचिंग सेंटरों का मायाजाल
लेकिन मैं आना चाहता हूँ फिर भी
क्यूंकि गुड़्डू की चाय नहीं बदली है
ना ही वो पतंग गली और महाशमशान
कचौड़ी -जलेबी -लौंगलता और मलइयो यहीं पर हैं
और केदार घाट का सूर्योदय तुम्हारा अभिमान है
ठंडाई अभी भी प्रसाद और महादेव का निवास है
काल भैरव कोतवाल और संकटमोचन हनुमान हैं
कबीरी फकीरी तुम्हारी फ़िज़ा में बरक़रार है
अरे , मेरी जन्मभूमि तुम ही तो हो बनारस।

कबीरी फकीरी तुम्हारी फ़िज़ा में बरक़रार है
ReplyDeleteअरे , मेरी जन्मभूमि तुम ही तो हो बनारस।
अपनी माटी का आकर्षण कभी कम नहीं होता, खींच ही लेती है उसकी आबो हवा
बहुत मर्मस्पर्शी रचना
बहुत बहुत धन्यवाद। आपने पढ़ा और अच्छा लगा। नव वर्ष की शुभकामनायें
Deleteनववर्ष की हार्दिक शुभकामनाएं
ReplyDelete👏👏👏
ReplyDeleteVery true
ReplyDeleteBahut khoob. Ekdam real.
ReplyDeleteman ki fizaon me umarta banaras
ReplyDeleteyaadon ki dhun pe thirakta banaras....
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