हल्का हल्का कोहरा छटने लगा था। सुबह के १० बज रहे होंगे। मैं चटाई लेके छत पे धूप सेंकने चल दिया था। साथ में मेरा विविध भारती का पिटारा था।
मैंने ऊपर आसमान देखा तो दो तीन पतंगे एक दूसरे को काटने की होड़ में थीं। आँख पे गमछा रखा , बनियान में आराम से धूप में लेट गया।
विविध भारती पे रफ़ी साहेब का गाना आ रहा था , चौदहवी का चाँद हो.. . आँखे बंद करने पे लाल रंग के गोले बन रहे थे। लग रहा था जिंदगी यही है।
माँ की आवाज़ आयी आके चाय और चूड़ा मटर ले जाओ , मैंने अनसुना कर दिया , फिर वही ऊपर आके मेरे ऊपर चिल्लाईं और नाश्ता रख दिया।
धूप बहुत हलकी थी , अगला गाना क्या हुआ तेरा वादा की फरमाईश गाज़ीपुर से हो चुकी थी। मैंने आँख खोल के देखा तो गिलासा ने चांदमारा ( पतंग के प्रकार )को हुच्छक के काट दिया था , वो निरदुन्द आसमान में बह रही थी। तभी बगल की छत पे तुम आती हो , मुझे देख के खिलखिला के हंस के वापस चली जाती हो।
गाना भी बदल गया इस बार ये रेशमी जुल्फे ये शरबती आँखें , तुम फिर दिखती हो इस बार बाल को झटकते हुए सुखाते हुए , मैं तुम्हे न देखने का नाटक करता हूँ गमछे के कपडे में से देखता हूँ , पानी की हलकी छीटें मेरे ऊपर भी आती हैं , पूरा तन झरझरा उठता है। तौलिये से बार बार तुम अपनी गीलीं जुल्फों को झाड़ रही हो जैसे कोई सूप फटकता है।
इस बार फिर माँ की आवाज़ आती है खाया की नहीं ? तुम अचानक से पीछे हट जाती हो , गाना बदल गया है कश्मीर की कली , तारीफ़ करूँ क्या उसकी जिसने तुम्हे बनाया। मैं उठता हूँ चूड़ा मटर खाता हूँ , चाय की चुस्कियां लेने लगता हूँ। माँ अब ऊपर आ गयीं हैं , अपने ढेर सारे काम लेके। मुझे मटर छीलने को दे दिया है। तुम अब तिरछी नज़रों से देख रही हो मुझे , माँ ने देख लिया पूछा , अरे सरिता नाश्ता वाश्ता हो गया की नहीं। हो गया आंटी जी , आज बाल धोये हैं वही सूखा रही हूँ छत पे। कौनसा शैम्पू लगाती हो , मैं तो परेशान हो गयी हूँ सर्दियों में बाल बहुत झड़ रहे हैं मेरे तुम लड़कियों का ही कुछ ट्राई करती हूँ।
मैं तुम्हे देख रहा हूँ मटर छीलते हुए गाना बदल गया है मैं जिंदगी का साथ निभाता चला गया हर फिक्र को धुंए में उड़ाता। ....
मैंने ऊपर आसमान देखा तो दो तीन पतंगे एक दूसरे को काटने की होड़ में थीं। आँख पे गमछा रखा , बनियान में आराम से धूप में लेट गया।
विविध भारती पे रफ़ी साहेब का गाना आ रहा था , चौदहवी का चाँद हो.. . आँखे बंद करने पे लाल रंग के गोले बन रहे थे। लग रहा था जिंदगी यही है।
माँ की आवाज़ आयी आके चाय और चूड़ा मटर ले जाओ , मैंने अनसुना कर दिया , फिर वही ऊपर आके मेरे ऊपर चिल्लाईं और नाश्ता रख दिया।
धूप बहुत हलकी थी , अगला गाना क्या हुआ तेरा वादा की फरमाईश गाज़ीपुर से हो चुकी थी। मैंने आँख खोल के देखा तो गिलासा ने चांदमारा ( पतंग के प्रकार )को हुच्छक के काट दिया था , वो निरदुन्द आसमान में बह रही थी। तभी बगल की छत पे तुम आती हो , मुझे देख के खिलखिला के हंस के वापस चली जाती हो।
गाना भी बदल गया इस बार ये रेशमी जुल्फे ये शरबती आँखें , तुम फिर दिखती हो इस बार बाल को झटकते हुए सुखाते हुए , मैं तुम्हे न देखने का नाटक करता हूँ गमछे के कपडे में से देखता हूँ , पानी की हलकी छीटें मेरे ऊपर भी आती हैं , पूरा तन झरझरा उठता है। तौलिये से बार बार तुम अपनी गीलीं जुल्फों को झाड़ रही हो जैसे कोई सूप फटकता है।
इस बार फिर माँ की आवाज़ आती है खाया की नहीं ? तुम अचानक से पीछे हट जाती हो , गाना बदल गया है कश्मीर की कली , तारीफ़ करूँ क्या उसकी जिसने तुम्हे बनाया। मैं उठता हूँ चूड़ा मटर खाता हूँ , चाय की चुस्कियां लेने लगता हूँ। माँ अब ऊपर आ गयीं हैं , अपने ढेर सारे काम लेके। मुझे मटर छीलने को दे दिया है। तुम अब तिरछी नज़रों से देख रही हो मुझे , माँ ने देख लिया पूछा , अरे सरिता नाश्ता वाश्ता हो गया की नहीं। हो गया आंटी जी , आज बाल धोये हैं वही सूखा रही हूँ छत पे। कौनसा शैम्पू लगाती हो , मैं तो परेशान हो गयी हूँ सर्दियों में बाल बहुत झड़ रहे हैं मेरे तुम लड़कियों का ही कुछ ट्राई करती हूँ।
मैं तुम्हे देख रहा हूँ मटर छीलते हुए गाना बदल गया है मैं जिंदगी का साथ निभाता चला गया हर फिक्र को धुंए में उड़ाता। ....
Hamesha ki tarah bahut sundar....cd find u sarita n bhabhi...so cd identify...loved it
ReplyDeleteAll characters and events depicted in this blog are entirely fictitious.
DeleteAny similarity to actual events or persons, living or dead, is purely coincidental.....
:)
Thanks for appreciating
Wonderful ! Brilliant! Right choice of words to express the subtle emotions...loved reading it....
ReplyDeleteGlad that you liked it madam..Thanks for your encouragement and reading .
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