Tuesday, 4 October 2016

यादें

ये यादें कम्भख्त छीन लेतीं हैं सारा चैन
निचोड़ के देखा तो भीग गया अंदर तक।

कुछ में तो ऐसा नशा था कि
लगा जैसे  चखा है  अभी अभी
चाय की वो चुस्कियां, ताज़ी हैं जेहन में
वो मुस्कुराहटें तुम्हारी , सरिता के तरह
बह रहीं थीं हृदय की हर धमनियों में

कुछ सूखी हुईं सी थी
नींद को कोसों दूर ले जानी वाली
 आंसुओं से भीगोने वालीं
बहती सरिता को झुलसा  देने वाली गर्मी की तरह
ये जरुरी हैं मुझे मेरी औकाद याद दिलाने के लिए


लेकिन कुछ यादें ऐसी थीं  जिनमे मैं
ठहर गया , समेट लिया उनमे खुद को
जैसे डुबकियां लगाईं हो इस शांत बहती सरिता में
तुम्हारे न होने का एहसास भी एक सुकून लाता है
इन्हीं यादों की वजह से

 वक़्त ठहरता है दोस्तों
इन्हीं यादों से इन्हीं यादों में
 हम  जीतें हैं बस इन्हीं यादों से
मरते भी बस  इनसे ही हैं !!

अंकुर 'बनारसी '



No comments:

Post a Comment