मुझे नहीं पता की मैं ये क्यों लिख रहा हूँ ? शायद जैसे लोग रविश कुमार को कांग्रेस आप सपा का दलाल बोलते हैं , मुझे भी रविश का दलाल बोलते होंगे या बोलने लगेंगे। आपिया या खुजलीवाल की पार्टी तो मैं हूँ ही ,इसिलए मेरी बात को हवा में उड़ा देना ही उचित लगेगा और रहेगा भी।
मुझे क्या चाहिए ? एक प्राइवेट कंपनी में काम करता हूँ , पेट भरने से ज्यादा कमा लेता हूँ बहुत है। बल्कि बहुतों से बहुत है और बहुतों से कम। मुझे क्या फर्क पड़ता है अगर मुझसे कहीं जबरदस्ती कपडा स्त्री करने के दोगुना पैसे , सब्जी के , ऑटो के , दाल चावल सबकुछ ज्यादा दामों पे मिलता हो तो। मैं तो खरीद सकता हूँ क्यूंकि में IT में काम करता हूँ। ये दर्द मैंने देश की IT हब कहे जाने वाले बेंगलुरु के whitefield में सहा और मिलेनियम सिटी गुडगाँव में भी देखता हूँ।
दो साल पहले रवीश जी ने कापासेड़ा गांव में बिहारी और उत्तर प्रदेश से आये मजदूरो पे हो रहे हो रहे शोषण को दिखाया था , २०१४ में विकसित गुजरात सूरत शहर में भी वही हाल और अब २०१५ मिलेनियम सिटी गुडगाँव में भी। गुडगाँव में तो मैंने खुद देखा है, जिस हाल में हमारे २०२० में सुपरपावर होने वाले देश का निर्माण करने वाला मजदूर रहता है और दुनिया के सबसे शक्तिशाली लोकतंत्र का भी। सुजुकी कंपनी का ६०% फायदा गुडगाँव में बनता है जो हमारे मजदूर करते हैं , उसके बदले में उन्हें पिंजरों में और जेल के जैसे माहौल में रहना होता है। मकान मालिक बोलता है की उसी के यहाँ से सारा राशन लेना होगा ज्यादा दाम पे वरना घर से घर से लात घूंसा मार के भगा देगा। वो मजदूर 6000 से ज्यादा नहीं कमाता है और 1000 बच जाये तो बहुत है। अपना घर बार परिवार सबकुछ छोड़ के वो मिलेनियम सिटी में आता है और मिलेनियम का एक हटा के शुन्य हो जाता है। मैं खुद राह चलते बहुत मजदूरों से बात करता रहा हूँ गुडगाँव, बेंगलुरु , दिल्ली हर जगह वही हाल है। बिहार से आके रिक्शा चलाने वाले जिस हाल में रहते हैं , अगर आप देख लेंगे तो रात को सो न सकेंगे। आप में से कुछ को लगने लगा होगा की मैं हमेशा की तरह गरीबों के लिए सोच के वाह वाही बटोरने में लगा हूँ और जल्दी ही केजरीवाल की कुछ तारीफ़ और मोदी जी पे कटाक्ष करके निकल लूंगा। लेकिन सच ये है की मजदूर को उसके मकान मालिक बचाने वाली कोई सरकार नहीं , न कांग्रेस २०१२ में , न बीजेपी २०१४ में। सबकुछ उपभोक्तावादी और उपनिवेशवादी ही है। मजदूर का क्या है वो उसी नरक में रहेगा , रविश दिखाते रहेंगे रामनाथ गोयनका मिलता रहेगा , मैं अपने को वही मजदूर समझता रहूँगा और लिखता रहूँगा , मजदूर यूनियन बोलते रहेंगे , आप ट्वीटियाते और एफ़बीयाते रहिएगा और सरकार इंडिया शाइन करती रहेगी।
मजदूर वोट नहीं देता पर नोट जरूर देता है। सोचियेगा !!!!
" मैं मजदूर मुझे देवों की बस्ती से क्या , अगणित बार धरा पे मैंने स्वर्ग बसाये "
मुझे क्या चाहिए ? एक प्राइवेट कंपनी में काम करता हूँ , पेट भरने से ज्यादा कमा लेता हूँ बहुत है। बल्कि बहुतों से बहुत है और बहुतों से कम। मुझे क्या फर्क पड़ता है अगर मुझसे कहीं जबरदस्ती कपडा स्त्री करने के दोगुना पैसे , सब्जी के , ऑटो के , दाल चावल सबकुछ ज्यादा दामों पे मिलता हो तो। मैं तो खरीद सकता हूँ क्यूंकि में IT में काम करता हूँ। ये दर्द मैंने देश की IT हब कहे जाने वाले बेंगलुरु के whitefield में सहा और मिलेनियम सिटी गुडगाँव में भी देखता हूँ।
दो साल पहले रवीश जी ने कापासेड़ा गांव में बिहारी और उत्तर प्रदेश से आये मजदूरो पे हो रहे हो रहे शोषण को दिखाया था , २०१४ में विकसित गुजरात सूरत शहर में भी वही हाल और अब २०१५ मिलेनियम सिटी गुडगाँव में भी। गुडगाँव में तो मैंने खुद देखा है, जिस हाल में हमारे २०२० में सुपरपावर होने वाले देश का निर्माण करने वाला मजदूर रहता है और दुनिया के सबसे शक्तिशाली लोकतंत्र का भी। सुजुकी कंपनी का ६०% फायदा गुडगाँव में बनता है जो हमारे मजदूर करते हैं , उसके बदले में उन्हें पिंजरों में और जेल के जैसे माहौल में रहना होता है। मकान मालिक बोलता है की उसी के यहाँ से सारा राशन लेना होगा ज्यादा दाम पे वरना घर से घर से लात घूंसा मार के भगा देगा। वो मजदूर 6000 से ज्यादा नहीं कमाता है और 1000 बच जाये तो बहुत है। अपना घर बार परिवार सबकुछ छोड़ के वो मिलेनियम सिटी में आता है और मिलेनियम का एक हटा के शुन्य हो जाता है। मैं खुद राह चलते बहुत मजदूरों से बात करता रहा हूँ गुडगाँव, बेंगलुरु , दिल्ली हर जगह वही हाल है। बिहार से आके रिक्शा चलाने वाले जिस हाल में रहते हैं , अगर आप देख लेंगे तो रात को सो न सकेंगे। आप में से कुछ को लगने लगा होगा की मैं हमेशा की तरह गरीबों के लिए सोच के वाह वाही बटोरने में लगा हूँ और जल्दी ही केजरीवाल की कुछ तारीफ़ और मोदी जी पे कटाक्ष करके निकल लूंगा। लेकिन सच ये है की मजदूर को उसके मकान मालिक बचाने वाली कोई सरकार नहीं , न कांग्रेस २०१२ में , न बीजेपी २०१४ में। सबकुछ उपभोक्तावादी और उपनिवेशवादी ही है। मजदूर का क्या है वो उसी नरक में रहेगा , रविश दिखाते रहेंगे रामनाथ गोयनका मिलता रहेगा , मैं अपने को वही मजदूर समझता रहूँगा और लिखता रहूँगा , मजदूर यूनियन बोलते रहेंगे , आप ट्वीटियाते और एफ़बीयाते रहिएगा और सरकार इंडिया शाइन करती रहेगी।
मजदूर वोट नहीं देता पर नोट जरूर देता है। सोचियेगा !!!!
" मैं मजदूर मुझे देवों की बस्ती से क्या , अगणित बार धरा पे मैंने स्वर्ग बसाये "
अच्छा लिखे हो श्रीमान
ReplyDeleteअति सुन्दर। मार्मिक होते हुए तर्क सहित।
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