Monday, 14 September 2015

बिकास नगरी का दर्द



"चला देख आई सजनी बिकास नगरी" मेरे  नाना ये गाना मुझे कई बार सुनाते हैं , बताते हैं जब हरित क्रांति  दुग्ध क्रांति आई तब गावं की महिलाएं जोर शोर से ये गीत गातीं थीं। 

घर धन और धान से संपन्न होने लगे थे और स्मिता पाटिल का वो अमूल का विज्ञापन मारे घर घन लक्ष्मी  बाजे वाला माहौल था ।  
विकास हो गया हम 2015 में आ गए , फेसबुक और ट्वीट करने लगे।  सेलेक्ट सिटी वाक , DLF में घूमने लगे , अंग्रेजी बड़बड़ाने लगे।  कैफ़े कॉफ़ी डे में समाज और तंत्र पे चर्चा भी करने लगे।  वायने रूनी में हमे ज्यादा आनंद आने लगा जितना की सचिन तेंदुलकर में आता में आता था।  ये सब अच्छा है , विकास है , और पैसा है मन है समाज है , जिसे जो करना है करे मैं कौन होता हूँ कटाक्ष करने वाला। .... लेकिन उसी सेलेक्ट सिटी वाक के पास लाडो सराये में दो अस्पताल एक 7 साल के बच्चे का डेंगू का केस लेने से मना  कर  देते हैं।  बच्चा बच नहीं पाता और उसके गम में माँ बाप आत्महत्या कर लेते हैं।  सुन के सोच के मेरी रूह  काँप उठती है जब मेरे मन के सामने उस माँ का खयाल  आता है।  सीरिया के शरणार्थी बच्चे की मृत्यु पे हमे बहुत अफ़सोस होता है  और होना भी चाहिए लेकिन ये जो हमारे राजधानी में हुआ है दर्दनाक शर्मनाक और नृशंस है। 

 मैंने जो कुछ देखा या सुना वो रविश जी के कैमरा से इस प्रकार था :


"मौत और आत्महत्या की ख़बर के बाद लगे कि लाडो सराय की कभी उपेक्षा नहीं हुई है, प्रवेश द्वार पर ही बने कूड़ा घर के बाहर चूने की लाइन बना दी गई थी। जिससे मीडिया को लगे कि यहां साफ सफाई होती है। साफ पता चल रहा था कि अभी अभी किया गया है। काश ऐसा ही पूरी दिल्ली या किसी भी शहर के साथ होता। तीन तीन मौत के बाद सिस्टम की यह नौटंकी और परेशान करने लगी। गांव के भीतर की दीवारों पर डेंगू से बचने के उपायों वाले पोस्टर लगा दिये गए थे। इन्हें देखकर ही लग रहा था कि पोस्टर एक दो दिन पुराने हैं। लोगों ने बताया कि यहां से लाश जाते ही एम सी डी वाले आ गए और पोस्टर लगा गए। पहले नहीं लगाया था। मेरी निगाह एक ऐसे ही पोस्टर पर पड़ी। उसके ऊपर  जनवरी से लेकर सितंबर तक की तारीख़ लिखी हुई थी। किसी को भी दिख सकता है कि सारी तारीख़ें एक ही पेंसिल, एक ही लिखावट और एक ही रोज़ लिखी गईं हैं। जनवरी की लिखावट सितंबर की लिखावट की तुलना में कुछ तो पुरानी दिखनी चाहिए। कुछ तो रंग में फर्क आना चाहिए था।


सिस्टम का हरकत में आना अच्छा है लेकिन इस तरह सफाई अभियान की तारीखें लिख कर जाना निर्लज्जता से कम नहीं है। लोगों ने बताया कि पहले फोगिंग हुई नहीं। अब जाकर फोगिंग भी हुई है। गांव से बाहर आने पर लोगों ने दिखाया कि सड़क के किनारे शौचालय बनने लगा है। मज़दूर तेज़ी से काम कर रहे थे। गांव वालों ने कहा कि ये मीडिया के डर से शौचालय बन रहा है। लोगों को दिखाने के लिए। इसके पहले गांव के आस पास कहीं भी सार्वजनिक शौचालय नहीं है। कोई गांव आता है तो उसे खुले में शौच करना पड़ता है। लाडो सराय के पास एक अच्छा सा पार्क है। बच्चों के लिए बने इस पार्क को मौजूदा सिस्टम के लिहाज़ से काफी अच्छा ही कहा जाएगा। इस पार्क में बायो शौचालय बना हुआ था। जिसे देखने चला गया। शौचालय की हालत बदतर हो चुकी थी। कोई रखरखाव नहीं। वहां मच्छरों ने राज कायम कर लिया था।"


क्या ये है हमारे देश की सच्चाई ?  एक तरफ सेलेक्ट सिटी वाक और एक तरफ  लाडो सराये । घोर निराशा होती है।  गुस्सा आता है तो बस लैपटॉप पे बैठ के कुछ भी लिख देता हूँ।   इसे एम सी डी बनाम दिल्ली सरकार, दिल्ली सरकार बनाम केंद्र सरकार करते हम थक जाएंगे। सारा कुछ सुलझ जाएगा तब भी ये हकीकत नहीं बदलने वाली है।  शर्मनाक  है कि जिस जगह पर तीन लोगों की मौत हुई हो उस जगह पर अपनी छवि बचाने के लिए एम सी डी लीपापोती कर रही है।सेलेक्ट सिटी वाक जरूर जाइए लेकिन सोचिये की हमारी और सरकारी तंत्र दोनों की कितनी लापरवाही है। विकास अभी बहुत दूर है !!!!!


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