जाड़ा यानी सर्दी का मौसम मेरे लिए सदा से ही दुष्कारी रहा है। मुझे सर्दी कुछ ज्यादा ही लगती है और ऊपर से एक नंबर का आलसी हूँ। सर्दी आपके इन सभी तत्वों को पूरा उभार देती है। एक दिन मुझसे किसी ने पूछा की तुम्हारा सबसे बड़ा दुश्मन कौन है , मैंने जवाब दिया वो व्यक्ति जो मेरे स्थान को मुझसे छीन लेता है तब जब मैं रजाई में हूँ और मुझे एक नया ठंडा स्थान देता है वो मेरा परम शत्रु है।
लेकिन जब मुझे इतनी तकलीफ है फिर मुझे पिछले १० दिनों से जाड़े की इतनी याद क्यों आ रही है , कारण है अत्यंत परमानन्द देने वाले भोज्य पदार्थ जैसे मटर की सलोनी , तिल गुड की पट्टी , चूड़ा मटर , मटर के पराठे , मटर की पूड़ी , कौरा मटर। मटर यानी मुझे अत्यंत प्रिय। क्या आनंद होता था सुबह सुबह यदि थोड़ा सा सूरज निकला है तो उसमे बैठ के गर्म चाय और चूड़ा मटर। अध्भुत , अविस्मरणीय वातावरण और एक ऐसी सिहरन जो मन को प्रफुल्लित करती है।
मुझे कोहरा देखे करीब ५ साल हो गए हैं , मैं ये मानता हूँ की ये भी अत्यंत दुखकारी है , परन्तु कोहरे का भी अपना एक आनंद है। मैं जब छोटा तथा तो सोचता था की जो लोगो के मुह से भाप निकलती है वही कोहरा है , आप विश्वास नहीं करेंगे मैंने कोहरे में भी पतंग उड़ाईं हैं और बाद में वो गल भी गयी है , सबसे दुःख तो १४ जनवरी को होता था जब संक्राति को आप दुष्ट कोहरे के कारण पतंग नहीं उड़ा सकते थे। कोहरे का फायदा ये है की आप किसी के घर की घंटी बजा के चुपके से भाग सकते हैं। जाड़े का एक और आनंद ये था की मुझे नहाना नहीं होता था क्यूंकि मैं जल्दी बीमार पड़ता था तो घरवाले भी जोर नहीं देते थे।
कल मैंने मटर बिकते हुए देखी एक माल में। एकदम सूखी हुई किसी लायक नहीं और दाम था 90 रुपये किलो। मैं कुछ देर तो यादों में खो गया पर फिर मैंने एक किलो खरीदा घर लाया , उसे छीला और कौर के खाया। कोई स्वाद नहीं था बस यादें थी और उन्ही के सहारे खा लिया। मैंने सोचा की घर चलते हैं बनारस , टिकट देखा तो क्षमता के बाहर था , और इनबॉक्स में मैनेजर साहेब की इ मेल थी , डिअर अंकुर प्लीज सेंड द डॉक्यूमेंट ASAP . मैंने यादों का पिटारा बंद किया , अंग्रेजी में जवाब लिखना शुरू किया और थैंक्स एंड रेगार्ड्स के साथ डॉक्यूमेंट बनाने लगा।
नौकरी ने कुछ दिया तो जरूर लेकिन बहुत कुछ छीन लिया। ये दिसंबर समाप्त हो रहा है और मैं बिना किसी स्वेटर लुगदी के एक बेस्वाद सी चाय पी रहा हूँ।
Happy Winters !! जाडा मुबारक।
लेकिन जब मुझे इतनी तकलीफ है फिर मुझे पिछले १० दिनों से जाड़े की इतनी याद क्यों आ रही है , कारण है अत्यंत परमानन्द देने वाले भोज्य पदार्थ जैसे मटर की सलोनी , तिल गुड की पट्टी , चूड़ा मटर , मटर के पराठे , मटर की पूड़ी , कौरा मटर। मटर यानी मुझे अत्यंत प्रिय। क्या आनंद होता था सुबह सुबह यदि थोड़ा सा सूरज निकला है तो उसमे बैठ के गर्म चाय और चूड़ा मटर। अध्भुत , अविस्मरणीय वातावरण और एक ऐसी सिहरन जो मन को प्रफुल्लित करती है।
मुझे कोहरा देखे करीब ५ साल हो गए हैं , मैं ये मानता हूँ की ये भी अत्यंत दुखकारी है , परन्तु कोहरे का भी अपना एक आनंद है। मैं जब छोटा तथा तो सोचता था की जो लोगो के मुह से भाप निकलती है वही कोहरा है , आप विश्वास नहीं करेंगे मैंने कोहरे में भी पतंग उड़ाईं हैं और बाद में वो गल भी गयी है , सबसे दुःख तो १४ जनवरी को होता था जब संक्राति को आप दुष्ट कोहरे के कारण पतंग नहीं उड़ा सकते थे। कोहरे का फायदा ये है की आप किसी के घर की घंटी बजा के चुपके से भाग सकते हैं। जाड़े का एक और आनंद ये था की मुझे नहाना नहीं होता था क्यूंकि मैं जल्दी बीमार पड़ता था तो घरवाले भी जोर नहीं देते थे।
कल मैंने मटर बिकते हुए देखी एक माल में। एकदम सूखी हुई किसी लायक नहीं और दाम था 90 रुपये किलो। मैं कुछ देर तो यादों में खो गया पर फिर मैंने एक किलो खरीदा घर लाया , उसे छीला और कौर के खाया। कोई स्वाद नहीं था बस यादें थी और उन्ही के सहारे खा लिया। मैंने सोचा की घर चलते हैं बनारस , टिकट देखा तो क्षमता के बाहर था , और इनबॉक्स में मैनेजर साहेब की इ मेल थी , डिअर अंकुर प्लीज सेंड द डॉक्यूमेंट ASAP . मैंने यादों का पिटारा बंद किया , अंग्रेजी में जवाब लिखना शुरू किया और थैंक्स एंड रेगार्ड्स के साथ डॉक्यूमेंट बनाने लगा।
नौकरी ने कुछ दिया तो जरूर लेकिन बहुत कुछ छीन लिया। ये दिसंबर समाप्त हो रहा है और मैं बिना किसी स्वेटर लुगदी के एक बेस्वाद सी चाय पी रहा हूँ।
Happy Winters !! जाडा मुबारक।
Wonderfully written!!..
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