बनारस अब तुम रात के २ बजे ज्यादा खूबसूरत लगते हो। धूआं और धूल ,चिलम के उठते गुबार में कहीं खो सा जाता है। तुम्हारी रूह तक पहुंचने का रास्ता अब इन्हीं खाली रास्तों से होकर गुज़रता है। सोडियम लैंप तुम्हारी आत्मा तक पहुंचने में सूरज से ज्यादा कारगर साबित हो रहे हैं । तुम्हारी रूह से उठता हुआ वो धुआं , मुझे बेबस पुकारता है , मुझे सन्नाटे का यही शोर पसंद है। क्यूँकि दूर कहीं मणिकर्णिका की प्रज्वलित अग्नि , और माँ गंगा से बेबस उठती वो लहरें मुझे मेरे होने का एहसास दिलाती हैं। मैं मणिकर्णिका को इसी समय महसूस करता हूँ। एक दिन तो आना ही है , पर तब महसूस न होगा , वो गंगा स्नान , और शून्य में विलीन होना। यही तुम्हारा सबसे ख़ास एहसास है , जो कहीं नहीं मिलता। बनारस तुम रात में जीते हो और दिन में मरते हो। बहुत थक के चूर होने के बाद की गहरी नींद का जो एहसास है , वो दिलाते रहना। मैंने खुद को छोड़ दिया है तुम्हारे आस पास उस एहसास पे , जहाँ महा शिवरात्रि की घनघोर रात दूर कहीं उस छोटे से मंदिर में वो अकेला गंजेड़ी जय सिया रामा की रट लगाए हुए है।
Wednesday, 14 February 2018
Saturday, 30 December 2017
मैं बनारसी हूँ लेकिन
हाँ मैं तुम्हारे पास आना चाहता हूँ
लेकिन तुम्हारी हवा में
सांस लेने से डर लगने लगा है |
शोर के बाज़ार में घंटों जाम
सुकून से दूर हर तरफ सिर्फ दूकान ही दूकान।
अस्सी से दूर जाती माँ गंगा
और उनमे शौच करते लोग |
घाटों के किनारे धोबी और साबुन के झाग
बदबू मारते शौच और पेशाब की महक
गलियों और सडकों पे अनगिनत गोवंश
कूड़े के ढेर में प्लास्टिक खाती गायें
माँ गंगा आरती में लूटते हुए पंडे
और BHU में घूमते हुए गुंडे
ना नौकरी सिर्फ भौकाल
कोचिंग सेंटरों का मायाजाल
लेकिन मैं आना चाहता हूँ फिर भी
क्यूंकि गुड़्डू की चाय नहीं बदली है
ना ही वो पतंग गली और महाशमशान
कचौड़ी -जलेबी -लौंगलता और मलइयो यहीं पर हैं
और केदार घाट का सूर्योदय तुम्हारा अभिमान है
ठंडाई अभी भी प्रसाद और महादेव का निवास है
काल भैरव कोतवाल और संकटमोचन हनुमान हैं
कबीरी फकीरी तुम्हारी फ़िज़ा में बरक़रार है
अरे , मेरी जन्मभूमि तुम ही तो हो बनारस।
Saturday, 21 October 2017
द सिन्दबाज़ पतंगबाज़
आज भी मैं जब भी कभी अपने घर की छत पर जाता हूँ , निगाहें एक बार पूरी छत पर सिर्फ यही देखती हैं, की कहीं कोई कटी पतंग तो नहीं आयी है।
एक बार ऊपर आसमान जरूर देखता हूँ की कहीं कोई पेंच तो नहीं लड़ रहे। कुछ देर के लिए मेरी जिंदगी ठहर सी जाती है बस ये सोच के , की मेरी जिंदगी का सबसे बड़ा मकसद शायद कालोनी की हर उड़ती पतंग को काट देना था। वो एक भ्रम था , मैं इतना बड़ा पतंगबाज़ कभी था ही नहीं। मेरी 40 % पतंगे आराम से काट जातीं थी। लेकिन आज भी मुझे उड़ती पतंगे देखना बहुत पसंद है , किस पतंगबाज़ ने क्या गलती की , ये मैं चुटकियों में समझ लेता हूँ। कटी हुई पतंगों को लूटना या लूटते हुए देखना भी शायद वर्ल्ड कप जीतने जैसा है। हारे हुए लड़कों की झुंझलाहट और उनका गुस्सा आज भी बरक़रार है। मैं इसी तरह हारता ही रहता था , और फ्रस्टियाता रहता था। पतंग भी अजीब चीज़ है , कटने के बाद उसी के घर में जाती थी जिसको उसकी कोई ज़रूरत नहीं। मेरी झूठी शालीनता से कई बार कालोनी के अंकल आंटी मुझे वो पतंग दे दिया करते थे या कई बार भगा देते थे।
मैं अब घर में नहीं कमरे में रहता हूँ , और आज भी शायद अपनी जिंदगी में औसत ही कर रहा हूँ , 60 % से थोड़ा ज्यादा ही अब भी हार जाता हूँ। मैं रोज़ अपनी जिंदगी से पेंच लड़ाता हूँ , ज्यादातर असफल ही रहता हूँ। जिंदगी से जंग एक आदत सी बन गयी है। आज भी कई बार सफलता उन्हें मिलते देखता हूँ जो शायद उसे ज्यादा तवज़्ज़ो नहीं देते। मुझे दूसरों की जंग देखना ज्यादा अच्छा लगता है , क्यूंकि मुझे पता रहता है वो क्यों जीता या फिर हारा। हारते हुए गिरना और फिर से नए जोश के साथ जंग लड़ते देखना मुझे सबसे ज्यादा पसंद है। मैं एक पतंगबाज़ था , मैं एक सिंदबाद हूँ।
एक बार ऊपर आसमान जरूर देखता हूँ की कहीं कोई पेंच तो नहीं लड़ रहे। कुछ देर के लिए मेरी जिंदगी ठहर सी जाती है बस ये सोच के , की मेरी जिंदगी का सबसे बड़ा मकसद शायद कालोनी की हर उड़ती पतंग को काट देना था। वो एक भ्रम था , मैं इतना बड़ा पतंगबाज़ कभी था ही नहीं। मेरी 40 % पतंगे आराम से काट जातीं थी। लेकिन आज भी मुझे उड़ती पतंगे देखना बहुत पसंद है , किस पतंगबाज़ ने क्या गलती की , ये मैं चुटकियों में समझ लेता हूँ। कटी हुई पतंगों को लूटना या लूटते हुए देखना भी शायद वर्ल्ड कप जीतने जैसा है। हारे हुए लड़कों की झुंझलाहट और उनका गुस्सा आज भी बरक़रार है। मैं इसी तरह हारता ही रहता था , और फ्रस्टियाता रहता था। पतंग भी अजीब चीज़ है , कटने के बाद उसी के घर में जाती थी जिसको उसकी कोई ज़रूरत नहीं। मेरी झूठी शालीनता से कई बार कालोनी के अंकल आंटी मुझे वो पतंग दे दिया करते थे या कई बार भगा देते थे।
मैं अब घर में नहीं कमरे में रहता हूँ , और आज भी शायद अपनी जिंदगी में औसत ही कर रहा हूँ , 60 % से थोड़ा ज्यादा ही अब भी हार जाता हूँ। मैं रोज़ अपनी जिंदगी से पेंच लड़ाता हूँ , ज्यादातर असफल ही रहता हूँ। जिंदगी से जंग एक आदत सी बन गयी है। आज भी कई बार सफलता उन्हें मिलते देखता हूँ जो शायद उसे ज्यादा तवज़्ज़ो नहीं देते। मुझे दूसरों की जंग देखना ज्यादा अच्छा लगता है , क्यूंकि मुझे पता रहता है वो क्यों जीता या फिर हारा। हारते हुए गिरना और फिर से नए जोश के साथ जंग लड़ते देखना मुझे सबसे ज्यादा पसंद है। मैं एक पतंगबाज़ था , मैं एक सिंदबाद हूँ।
Monday, 10 April 2017
चालू यात्रा वृतांत - वो यादगार सफर
ट्रेन के सफर में ,आजकल मुझे काफी मौके मिलते हैं चालू ( General ) श्रेणी में चलने के। ये एक अध्भुत अनुभव होता है। इसमें जो बात है वो जहाज के बिज़नेस क्लास में भी नहीं। सबसे ख़ास बात जिस ट्रेन में मन करे चढ़ जाईये , और ऐसे लोगो से आपकी मुलाक़ात होगी की सफर पता नहीं चलेगा। बस दिक्कत होती है तो शौचालय जाने में आप उसके आस पास भी नहीं फटक सकते , और हाँ कोच भी अध्भुत महकता रहता है , इसके लिए दोष मैं जनता को दूंगा ना की सरकार को।
बहरहाल इस बार मैंने सारनाथ एक्सप्रेस पकड़ी ४०किमी दूर जाना था , तो चालू कोच में चढ़ गया दौड़ते हुए , याद रहे चालू में सीट पाना एक कला है और ये आपको अनुभव से ही आ सकती है। मुझे सीट मिल गयी और बगल में दो अधेड़ उम्र के लोग आके बैठे। उनमे से एक जिसका रंग गेहुआं आँखें बड़ी बड़ी और चमकदार शर्ट पहनी हुई थी बोला , वाह सीट मिल गयी अब रायपुर तक आराम से जाऊँगा। मैं अभी चुप बैठा था।
तभी अचानक उसने चिल्लाया हे भगवान् मेरी जेब किसी ने काट ली, और आस पास शंका और उत्सुकता का माहौल बन गया। ट्रेन चल पड़ी और उस व्यक्ति की आँखें सब कुछ बयां कर रही थीं। उसने किसी को कह के अपना ATM ब्लॉक करने का प्रयास किया और कहा सब कमाई उसी में है , चोर सब ले गया , मेरे पास बस एक रुपया है , और उसकी आँखें भर आयीं। मैं चुप चाप सब देख रहा था , एक शंका के साथ की कहीं कोई गिरोह न हो या कुछ धोखा जो की सामान्य है आजकल। दो तीन स्टेशन गुज़र गए , और मैं उसकी आँखें देख रहा था , उसमे मोटे मोटे आंसू थे जो बह नहीं पा रहे थे। लोग उसी को कोस रहे थे , क्यों रखा पीछे की जेब में वगैरह वगैरह। वो शायद कोई साधारण कर्मचारी था और उड़ीसा में किसी तरह पैसे जोड़े थे। बोला रायपुर से उड़ीसा जाना है और सारे पैसे टिकट सब चला गया है। हे भगवन मेरा ATM बचा लो और किसी तरह रायपुर पंहुचा दो साड़ी कमाई उसी में है।
करीब आधे घंटे बाद मैं बोला , एटीएम ब्लॉक हुआ ? वो बोला नहीं। मैंने उसे बैंक का टोल फ्री नंबर दिया और उसे ब्लॉक करवा दिया। उसे थोड़ा सुकून मिला , मेरा स्टेशन आने वाला था , दोपहर की चिलचिलाती गर्मी थी , उसके पास एक रुपया था और उसे 18 घंटे यात्रा करनी थी। भूखा और प्यासा वो दुखी बैठा था। मेरा स्टेशन आ ही गया था , मैंने उसे कुछ पैसे दिए बोला रख लो कुछ तो काम आ जायेगा ( मै ऐसा कभी नहीं करता हूँ और थोड़ा स्वार्थी आदमी हूँ ) वो बोला बिलकुल नहीं भैया , मैं बिना टिकट जेल चला जाऊँगा लेकिन पैसे नहीं लूंगा , आस पास वाले भी बोले ले लो , पर वो मना करने लगा। फिर मैंने कहा इतने पैसों का मेरा मोबाइल रिचार्ज करवा देना। उसने पैसे ले लिए और एक गज़ब की संतुष्टि हम दोनों को थी। मैं अपने स्टेशन पर उतर गया।
करीब चार दिन बाद मेरे पास एक फ़ोन आया , बोला भैया आपने जो पैसे दिए थे वो मेरे लिए 1 लाख रुपये के बराबर थे। मैं उड़ीसा पहुंच गया हूँ और आपका आभारी हूँ , रिचार्ज करवा दे रहा हूँ , आप मेरे लिए भगवान् की तरह आये थे। मैं थोड़ा भावुक हुआ और सोचा , मैं भी तो उस स्थिति में हो सकता था। एक इंसान ही इंसान के काम आता है।
ये अनुभव मैं अपना गुणगान करने के लिए नहीं साझा किया , ये बताने के लिए कहीं न कहीं इस भाग दौड़ वाली जिंदगी में हमे आस पास देखना चाहिए और यदि संभव है तो किसी जरूरतमंद की हर संभव सहायता करनी चाहिए, लोगों से बात करनी चाहिए आमने सामने, और व्हाट्सअप और फेसबुक को थोड़ा विराम देना चाहिए । ये हमने बचपन में सुना पढ़ा देखा है , पर कहीं न कहीं भूलने लगे हैं।
मुझे जो संतोष का अनुभव हुआ वो मैं आपको बयां नहीं कर सकता। जीवन का आनंद लीजिये।
बहरहाल इस बार मैंने सारनाथ एक्सप्रेस पकड़ी ४०किमी दूर जाना था , तो चालू कोच में चढ़ गया दौड़ते हुए , याद रहे चालू में सीट पाना एक कला है और ये आपको अनुभव से ही आ सकती है। मुझे सीट मिल गयी और बगल में दो अधेड़ उम्र के लोग आके बैठे। उनमे से एक जिसका रंग गेहुआं आँखें बड़ी बड़ी और चमकदार शर्ट पहनी हुई थी बोला , वाह सीट मिल गयी अब रायपुर तक आराम से जाऊँगा। मैं अभी चुप बैठा था।
तभी अचानक उसने चिल्लाया हे भगवान् मेरी जेब किसी ने काट ली, और आस पास शंका और उत्सुकता का माहौल बन गया। ट्रेन चल पड़ी और उस व्यक्ति की आँखें सब कुछ बयां कर रही थीं। उसने किसी को कह के अपना ATM ब्लॉक करने का प्रयास किया और कहा सब कमाई उसी में है , चोर सब ले गया , मेरे पास बस एक रुपया है , और उसकी आँखें भर आयीं। मैं चुप चाप सब देख रहा था , एक शंका के साथ की कहीं कोई गिरोह न हो या कुछ धोखा जो की सामान्य है आजकल। दो तीन स्टेशन गुज़र गए , और मैं उसकी आँखें देख रहा था , उसमे मोटे मोटे आंसू थे जो बह नहीं पा रहे थे। लोग उसी को कोस रहे थे , क्यों रखा पीछे की जेब में वगैरह वगैरह। वो शायद कोई साधारण कर्मचारी था और उड़ीसा में किसी तरह पैसे जोड़े थे। बोला रायपुर से उड़ीसा जाना है और सारे पैसे टिकट सब चला गया है। हे भगवन मेरा ATM बचा लो और किसी तरह रायपुर पंहुचा दो साड़ी कमाई उसी में है।
करीब आधे घंटे बाद मैं बोला , एटीएम ब्लॉक हुआ ? वो बोला नहीं। मैंने उसे बैंक का टोल फ्री नंबर दिया और उसे ब्लॉक करवा दिया। उसे थोड़ा सुकून मिला , मेरा स्टेशन आने वाला था , दोपहर की चिलचिलाती गर्मी थी , उसके पास एक रुपया था और उसे 18 घंटे यात्रा करनी थी। भूखा और प्यासा वो दुखी बैठा था। मेरा स्टेशन आ ही गया था , मैंने उसे कुछ पैसे दिए बोला रख लो कुछ तो काम आ जायेगा ( मै ऐसा कभी नहीं करता हूँ और थोड़ा स्वार्थी आदमी हूँ ) वो बोला बिलकुल नहीं भैया , मैं बिना टिकट जेल चला जाऊँगा लेकिन पैसे नहीं लूंगा , आस पास वाले भी बोले ले लो , पर वो मना करने लगा। फिर मैंने कहा इतने पैसों का मेरा मोबाइल रिचार्ज करवा देना। उसने पैसे ले लिए और एक गज़ब की संतुष्टि हम दोनों को थी। मैं अपने स्टेशन पर उतर गया।
करीब चार दिन बाद मेरे पास एक फ़ोन आया , बोला भैया आपने जो पैसे दिए थे वो मेरे लिए 1 लाख रुपये के बराबर थे। मैं उड़ीसा पहुंच गया हूँ और आपका आभारी हूँ , रिचार्ज करवा दे रहा हूँ , आप मेरे लिए भगवान् की तरह आये थे। मैं थोड़ा भावुक हुआ और सोचा , मैं भी तो उस स्थिति में हो सकता था। एक इंसान ही इंसान के काम आता है।
ये अनुभव मैं अपना गुणगान करने के लिए नहीं साझा किया , ये बताने के लिए कहीं न कहीं इस भाग दौड़ वाली जिंदगी में हमे आस पास देखना चाहिए और यदि संभव है तो किसी जरूरतमंद की हर संभव सहायता करनी चाहिए, लोगों से बात करनी चाहिए आमने सामने, और व्हाट्सअप और फेसबुक को थोड़ा विराम देना चाहिए । ये हमने बचपन में सुना पढ़ा देखा है , पर कहीं न कहीं भूलने लगे हैं।
मुझे जो संतोष का अनुभव हुआ वो मैं आपको बयां नहीं कर सकता। जीवन का आनंद लीजिये।
Sunday, 27 November 2016
जाड़े की धूप -लघु प्रेम कथा -2
हल्का हल्का कोहरा छटने लगा था। सुबह के १० बज रहे होंगे। मैं चटाई लेके छत पे धूप सेंकने चल दिया था। साथ में मेरा विविध भारती का पिटारा था।
मैंने ऊपर आसमान देखा तो दो तीन पतंगे एक दूसरे को काटने की होड़ में थीं। आँख पे गमछा रखा , बनियान में आराम से धूप में लेट गया।
विविध भारती पे रफ़ी साहेब का गाना आ रहा था , चौदहवी का चाँद हो.. . आँखे बंद करने पे लाल रंग के गोले बन रहे थे। लग रहा था जिंदगी यही है।
माँ की आवाज़ आयी आके चाय और चूड़ा मटर ले जाओ , मैंने अनसुना कर दिया , फिर वही ऊपर आके मेरे ऊपर चिल्लाईं और नाश्ता रख दिया।
धूप बहुत हलकी थी , अगला गाना क्या हुआ तेरा वादा की फरमाईश गाज़ीपुर से हो चुकी थी। मैंने आँख खोल के देखा तो गिलासा ने चांदमारा ( पतंग के प्रकार )को हुच्छक के काट दिया था , वो निरदुन्द आसमान में बह रही थी। तभी बगल की छत पे तुम आती हो , मुझे देख के खिलखिला के हंस के वापस चली जाती हो।
गाना भी बदल गया इस बार ये रेशमी जुल्फे ये शरबती आँखें , तुम फिर दिखती हो इस बार बाल को झटकते हुए सुखाते हुए , मैं तुम्हे न देखने का नाटक करता हूँ गमछे के कपडे में से देखता हूँ , पानी की हलकी छीटें मेरे ऊपर भी आती हैं , पूरा तन झरझरा उठता है। तौलिये से बार बार तुम अपनी गीलीं जुल्फों को झाड़ रही हो जैसे कोई सूप फटकता है।
इस बार फिर माँ की आवाज़ आती है खाया की नहीं ? तुम अचानक से पीछे हट जाती हो , गाना बदल गया है कश्मीर की कली , तारीफ़ करूँ क्या उसकी जिसने तुम्हे बनाया। मैं उठता हूँ चूड़ा मटर खाता हूँ , चाय की चुस्कियां लेने लगता हूँ। माँ अब ऊपर आ गयीं हैं , अपने ढेर सारे काम लेके। मुझे मटर छीलने को दे दिया है। तुम अब तिरछी नज़रों से देख रही हो मुझे , माँ ने देख लिया पूछा , अरे सरिता नाश्ता वाश्ता हो गया की नहीं। हो गया आंटी जी , आज बाल धोये हैं वही सूखा रही हूँ छत पे। कौनसा शैम्पू लगाती हो , मैं तो परेशान हो गयी हूँ सर्दियों में बाल बहुत झड़ रहे हैं मेरे तुम लड़कियों का ही कुछ ट्राई करती हूँ।
मैं तुम्हे देख रहा हूँ मटर छीलते हुए गाना बदल गया है मैं जिंदगी का साथ निभाता चला गया हर फिक्र को धुंए में उड़ाता। ....
मैंने ऊपर आसमान देखा तो दो तीन पतंगे एक दूसरे को काटने की होड़ में थीं। आँख पे गमछा रखा , बनियान में आराम से धूप में लेट गया।
विविध भारती पे रफ़ी साहेब का गाना आ रहा था , चौदहवी का चाँद हो.. . आँखे बंद करने पे लाल रंग के गोले बन रहे थे। लग रहा था जिंदगी यही है।
माँ की आवाज़ आयी आके चाय और चूड़ा मटर ले जाओ , मैंने अनसुना कर दिया , फिर वही ऊपर आके मेरे ऊपर चिल्लाईं और नाश्ता रख दिया।
धूप बहुत हलकी थी , अगला गाना क्या हुआ तेरा वादा की फरमाईश गाज़ीपुर से हो चुकी थी। मैंने आँख खोल के देखा तो गिलासा ने चांदमारा ( पतंग के प्रकार )को हुच्छक के काट दिया था , वो निरदुन्द आसमान में बह रही थी। तभी बगल की छत पे तुम आती हो , मुझे देख के खिलखिला के हंस के वापस चली जाती हो।
गाना भी बदल गया इस बार ये रेशमी जुल्फे ये शरबती आँखें , तुम फिर दिखती हो इस बार बाल को झटकते हुए सुखाते हुए , मैं तुम्हे न देखने का नाटक करता हूँ गमछे के कपडे में से देखता हूँ , पानी की हलकी छीटें मेरे ऊपर भी आती हैं , पूरा तन झरझरा उठता है। तौलिये से बार बार तुम अपनी गीलीं जुल्फों को झाड़ रही हो जैसे कोई सूप फटकता है।
इस बार फिर माँ की आवाज़ आती है खाया की नहीं ? तुम अचानक से पीछे हट जाती हो , गाना बदल गया है कश्मीर की कली , तारीफ़ करूँ क्या उसकी जिसने तुम्हे बनाया। मैं उठता हूँ चूड़ा मटर खाता हूँ , चाय की चुस्कियां लेने लगता हूँ। माँ अब ऊपर आ गयीं हैं , अपने ढेर सारे काम लेके। मुझे मटर छीलने को दे दिया है। तुम अब तिरछी नज़रों से देख रही हो मुझे , माँ ने देख लिया पूछा , अरे सरिता नाश्ता वाश्ता हो गया की नहीं। हो गया आंटी जी , आज बाल धोये हैं वही सूखा रही हूँ छत पे। कौनसा शैम्पू लगाती हो , मैं तो परेशान हो गयी हूँ सर्दियों में बाल बहुत झड़ रहे हैं मेरे तुम लड़कियों का ही कुछ ट्राई करती हूँ।
मैं तुम्हे देख रहा हूँ मटर छीलते हुए गाना बदल गया है मैं जिंदगी का साथ निभाता चला गया हर फिक्र को धुंए में उड़ाता। ....
Tuesday, 4 October 2016
यादें
ये यादें कम्भख्त छीन लेतीं हैं सारा चैन
निचोड़ के देखा तो भीग गया अंदर तक।
कुछ में तो ऐसा नशा था कि
लगा जैसे चखा है अभी अभी
चाय की वो चुस्कियां, ताज़ी हैं जेहन में
वो मुस्कुराहटें तुम्हारी , सरिता के तरह
बह रहीं थीं हृदय की हर धमनियों में
कुछ सूखी हुईं सी थी
नींद को कोसों दूर ले जानी वाली
आंसुओं से भीगोने वालीं
बहती सरिता को झुलसा देने वाली गर्मी की तरह
ये जरुरी हैं मुझे मेरी औकाद याद दिलाने के लिए
लेकिन कुछ यादें ऐसी थीं जिनमे मैं
ठहर गया , समेट लिया उनमे खुद को
जैसे डुबकियां लगाईं हो इस शांत बहती सरिता में
तुम्हारे न होने का एहसास भी एक सुकून लाता है
इन्हीं यादों की वजह से
वक़्त ठहरता है दोस्तों
इन्हीं यादों से इन्हीं यादों में
हम जीतें हैं बस इन्हीं यादों से
मरते भी बस इनसे ही हैं !!
अंकुर 'बनारसी '
निचोड़ के देखा तो भीग गया अंदर तक।
कुछ में तो ऐसा नशा था कि
लगा जैसे चखा है अभी अभी
चाय की वो चुस्कियां, ताज़ी हैं जेहन में
वो मुस्कुराहटें तुम्हारी , सरिता के तरह
बह रहीं थीं हृदय की हर धमनियों में
कुछ सूखी हुईं सी थी
नींद को कोसों दूर ले जानी वाली
आंसुओं से भीगोने वालीं
बहती सरिता को झुलसा देने वाली गर्मी की तरह
ये जरुरी हैं मुझे मेरी औकाद याद दिलाने के लिए
लेकिन कुछ यादें ऐसी थीं जिनमे मैं
ठहर गया , समेट लिया उनमे खुद को
जैसे डुबकियां लगाईं हो इस शांत बहती सरिता में
तुम्हारे न होने का एहसास भी एक सुकून लाता है
इन्हीं यादों की वजह से
वक़्त ठहरता है दोस्तों
इन्हीं यादों से इन्हीं यादों में
हम जीतें हैं बस इन्हीं यादों से
मरते भी बस इनसे ही हैं !!
अंकुर 'बनारसी '
Friday, 29 January 2016
जश्न ऐ रोज़गार
आज फिर से खड़ा हूँ खामोश उसी साहिल पे
जहाँ कभी दरिया हुआ करता था
तुम आती थी अपने दुपट्टे को लहराते हुए
हवा पे सवार हम बेफिक्री से उड़ा करते थे
मेरे मोबाइल के स्क्रीनसेवर पे तुम्हारा जिक्र था
रिंगटोन भी कमबख्त रहमान की बेसुवादी रातों की थीं
जानता था मैं की तुम अभी सोयी नहीं होगी
फिर भी मैंने तुम्हारे सवाल का जवाब नहीं दिया !!
हाँ इश्क़ किया था मैंने तुमसे ही
कश भी लगाये थे जो धुंए में उड़ गए
बहारों का इंतज़ार भी किया था कांटो में बैठ कर
पर सबकुछ खो दिया मैंने इस रोज़गार ऐ जश्न को मना कर !!
जहाँ कभी दरिया हुआ करता था
तुम आती थी अपने दुपट्टे को लहराते हुए
हवा पे सवार हम बेफिक्री से उड़ा करते थे
मेरे मोबाइल के स्क्रीनसेवर पे तुम्हारा जिक्र था
रिंगटोन भी कमबख्त रहमान की बेसुवादी रातों की थीं
जानता था मैं की तुम अभी सोयी नहीं होगी
फिर भी मैंने तुम्हारे सवाल का जवाब नहीं दिया !!
हाँ इश्क़ किया था मैंने तुमसे ही
कश भी लगाये थे जो धुंए में उड़ गए
बहारों का इंतज़ार भी किया था कांटो में बैठ कर
पर सबकुछ खो दिया मैंने इस रोज़गार ऐ जश्न को मना कर !!
आज फिर से खड़ा हूँ खामोश उसी साहिल पे
जहाँ कभी दरिया हुआ करता था !
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