Tuesday, 4 February 2014

स्वागत है ऋतुराज

पर्वतों के बीच सूर्योदय के साथ 
लहरों से तेज़ सागर के पार, 
अग्नि से उष्ण चंद्रमा से शीतल 
संगीत कि ध्वनियों के भीतर. 

आज नभ में छा गए हो 
वसुंधरा महका गए हो ,
कर रहा हर कोई तुम्हारा यशोगान 
पुलकित प्रसन्न है हर इंसान। 

प्रकृति का श्रृंगार हो तुम 
आनंद एवं उल्लास हो तुम ,
पुलकित पल्लव शाखाओ पर 
पुष्प सुगन्धित आभाओं पर 
आत्मा का परमात्मा से  
कर रहे तुम मिलन आज 
तुम ही हो ऋतुराज। 

ऋतुराज तुम अनंत हो 
कुसुमाकर और शिशिरांत हो 
हर हृदय को कर प्रफ्फुलित 
छेड़ कर वसंत राग 
स्वागत है  स्वागत है आज।  
                                                ( वसंत पंचमी पे वसंत आगमन पर )

Monday, 20 January 2014

कहाँ हैं सुकून ?

अरे पाण्डेय जी पता है आपको ,  फ़लाने ने डिमाका जगह पे 2 BHK ले लिया है , फलाना का डिमाका वीजा लग गया अब वो पैसे में खेलेगा , अभी अभी पता चला टिंकू ने स्विच मार दिया , अबे तुम्हे पता है ऊ बोकवा रजुवा भी बियाह कर लिया

कुछ दिन बाद ऐसे ही वापस मैंने फ़लाने से पूछा 2 BHK कैसा है ? जवाब आया अबे बस सोना होता है बाकी टाइम तो दफ्तर में रहतें हैं माँ बाबूजी को यहाँ आना   पसंद नहीं, कुछ अच्छा नहीं लगता अब,.

विजवा वाले से पूछा अबे दबा के कमा रहे होगे परदेस में बोला भैया कौनो सुकून नहीं है कौन कब आके गोली मार दे डर लगा रहता है , बाबूजी कि तबियत ठीक नहीं रहती लेकिन उनको देख नहीं सकते इसलिए दुखी रहते हैं.।

टिंकू से बात हुई नयी कंपनी तो मस्त होगी भाई अच्छा कमा रहे होगे काम भी बढ़िया होगा , जवाब आया अबे कौन बढ़िया, दिन रात काम है सपोर्ट का , कुछ सीखने को नहीं एक ही चीज रोज अब तो उब गया हूँ नयी खोज रहा हूँ। …

रजुवा से बात हुई बोला लड़की थोड़ी ज्यादा चालाक निकली हमपे दहेज़ का मुकदमा ठोक  दिया है , आजकल तो कचहरी के चक्कर लगे हुए हैं.।

मुझे भी चक्कर आ गया.…।  खाओ पीयो, स्वस्थ रहो मस्त रहो ( इतना आसान नहीं )

Thursday, 24 October 2013

गुलाबी ठंडक के गुलाब


मन के  पतंग  कि डोर बस तेरे ही ओऱ जाती है 
ये बसंती  हवा बस तेरा ही एहसास दिलाती है 
दूर कहीं किरणो के आने कि आहट  है 
सन्नाटों को चीरती कोयल कि कूक 
पल प्रतिपल तुझे पुकारती है 

ये सवेरा है  

वो देखो सामने प्रस्फुटित हो गया प्रत्युष 
सरिता पे नव अंकुरित भास्कर 
आह! इसे देख के बस तुम ही याद आते हो 
गुलाबी ठंडक के गुलाब 

तुम बहुत याद आते हो !!

Sunday, 15 September 2013

अभी आज़ाद होना बाकी है


आँख खुलना नहीं चाह रही थी पर मैंने अपने ही  हाथो से उस चुभती आवाज़ का अलार्म लगाया था जो कह रहा था सपने छोड़ दे बालक और तैयार हो जा अपनी असली जिंदगी के लिए। मैंने उसे बंद करके खुद को समझाना चाहा की अभी भी पाचं मिनट  और सपने देख सकता हूँ तभी एक नयी आवाज़ के साथ फ़ोन बज गया ,मेनेजर साहेब का, मैंने आवाज़ बदल के उनसे बात करके उन्हें ये एहसास दिलाना चाहा की मैं निकल चूका हूँ जंग के लिए , लेकिन उधर से आवाज़ आई दस बजे मिलो। 
घडी देखी  तो नौ बज चुके थे नहाना मुश्किल था किसी तरह कौवा नाहन करके जैसे ही घर से निकला दस किलोमीटर लम्बा जाम।।।मेरी सुबह हो चुकी थी पंद्रह मिनट  के रास्ते के लिए मुझे डेढ़ घंटे लग गए थे , जैसे तैसे मालिक के पास पंहुचा , उन्होंने ऊपर से नीचे तक देखा और अंग्रेजी में कहा यू हव तो चेंज अंकुर , और पता नहीं पूरे दुनिया का अर्थशास्त्र  समझा दिया और मुझे अमर्त्य सेन समझ के सारा काम दे दिया। सच कहूँ तो मेरी कुछ समझ ही नहीं आया क्यूंकि मैं अभी भी प्रेमचंद के पात्र दुक्खी में  घूम रहा था और जाम में बिताये डेढ़ घंटे की यात्रा से बाहर न आ सका था।

बहरहाल दो इडली खाने के बाद जब ईमेल देखी तो एहसास हुआ की काम अमर्त्य सेन के बस का भी नहीं है , इसे सिर्फ महाराज गूगल कर सकते हैं , उनकी शरण में जा ही रहा था की सन्देश आया "हे अंकुर आई ऍम गोइंग अमेरिका " मुझे तुरंत सन्देश भेजने वाले का चेहरा याद आया कैसे वो ३ साल पहले जिंदगी से हार निराश लग रहा था और मेरे पास आके कहा था नौकरी नहीं तो कुछ नहीं, खैर अब उसके नौकरी भी थी और छोकरी भी वीसा के साथ। मैं बहुत जल्दी यादों में खो जाता हूँ , और मुझे फिर बनारस की वो सुबह याद आ रही थी जब माँ बड़े प्यार से आवाज़ देके उठा रही थी और घने कोहरे को देख के रजाई तान के दुबक चूका था , पिताजी आये और कहे अब धरती पे लात मार दीजिये , ऐसा क्यूँ होता है की पिताजी की एक आवाज़ से ही सारे काम हो जाते हैं। काम से याद आया मैं अमर्त्य सेन हूँ और मुझे अभी अभी मेरी कम्पनी को मुनाफा देने का काम मिला है , खैर मैंने भी एक आवाज़ लगायी और एक और अमर्त्य सेन जूनियर  को बुला के सार काम उसे सौंप दिया और चाय पीने चल दिया।

मशीन की बनी चाय कितनी भी अच्छी हो चाय नहीं होती , पर तभी पीछे से आवाज़ आई हे मैन वास्सुप , मैंने देखा तो एक एकदम जेंटलमैन माफिक दिखने वाला आदमी जो लगता था की अमेरिका और इंग्लैंड में ही पैदा हुआ है बुला रहा था, मुझे याद नहीं वो कौन था जब बात की तो याद आया ये तो गाजीपुर का एक पुराना मित्र था जो इंग्लैंड और अमेरिका जा चूका था पर अंग्रेजी अभी भी बना के बोल रहा था, उससे पता चला की यदि आप सॉफ्टवेर कंपनी में हैं तो विदेश जाना बहुत जरुरी है।मैंने सहमती में सर हिलाया और उसी के अंदाज़ में उसे कहा ओके मैन बाए, मैं  फिर सोच में डूब गया यहाँ हर आदमी एक दूसरे  को मैन मैन क्यूँ कहता है, क्या ये सभी नपुंसक हैं या मैन बोलने से ही विदेश जाते हैं।।

वापस आया तो मेनेजर साहेब मिल गए उन्होंने जो भी कुछ पुछा मैंने सब का जवाब हाँ में दिया और कहा शाम तक आपको मिल जायेगा, फिर अमर्त्य सेन जूनियर को बुला के पुछा भाई कुछ हुआ उसने कहा गूगल डाउन है ज्यादा कुछ नहीं हो पा रहा।
मैं फिर सोच में डूब गया की अगर गूगल डाउन हो जाए तो ये सब जेंटलमैन मैन से मानव बन जायेंगे और पाषाण युग वापिस आ जायेगा।
भोजन का समय हो चूका था , कैंटीन में जाके मेनू देखा तो लगा की वहां जो भी कुछ लिखा है वो सब दूसरी दुनिया की चीजें हैं , ये  बाथ वो बाथ , उत्तू कुट्टू , आम्भर साम्भर। फिर मुझे एहसास हुआ मैन लोग यही खाते हैं। मैंने भोजन का ख्वाब छोड़ एक कप चाय और मारी और वापिस आ गया। ईमेल पे ईमेल थी मैंने उनका सब्जेक्ट पढ़ के डिलीट किया और गूगल देवता का आव्हान किया , इस बार वो प्रकट हुए और आशीर्वाद दिया , काम हो गया , पर मैंने शाम तक का वक़्त माँगा था तो आराम से गूगल देवता पे अन्य चीजों जैसे समाचार, तस्वीरें, खेल आदि को देखने लगा , अगर मुझे कोई ये करते दूर से देखेगा तो उसे लगेगा मैं सचमुच का बहुत ग्यानी सॉफ्टवेर ज्ञाता हूँ।

दोपहर बीत रही थी इतने में एक और मैन आके पूछते हैं व्हेन यु आर गोइंग तो अमेरिका , मैं  झुंजला चूका था अमेरिका सुनके , मैंने उनसे कहा नेवर , आयी एम् हैप्पी ..., फिर सोच में डूब गया , क्या मैं  सही में खुश हूँ , इस बर्गर और काफी से ?? इस गूगल और सॉफ्टवेर से ?, इस मेनेजर और खुद से? शनिवार और रविवार की छुट्टी से? इस वातानुकूलित आफिस से?? मैन  मैन से?
डॉलर पौंड से? इन्सौर्सिंग आउटसोर्सिंग से? कॉर्पोरेट से? 

तभी सन्देश आया सेंड डॉक्यूमेंट ...मैं अपनी कुर्सी से उठा और बस चल दिया डॉलर से बाहर , कंप्यूटर से बाहर , ऐ सी से बाहर , मैन  मैन से बाहर और वापिस जा पंहुचा अपनी उसी रजाई में प्रेमचंद को हाथ में लिए झूरी और दुक्खी को सोचते हुए, भारत को सोचते हुए  और ये सोचते हुए की कब तक सोचता ही रहूँगा ...कब कुछ करूँगा?? कब कुछ बनूँगा ?? अभी इंजिनियर बनना बाकी है अभी हिंदुस्तानी बनना बाकी है, अभी दुक्खी और झुरी के लिए कुछ करना बाकी है ....अभी आज़ाद होना बाकी है।

अलार्म बज रहा था और मैं शायद सपना ही देख रहा था।

Thursday, 12 September 2013

तू कौन है

 बस तू ही दिखाई देती है 
 महकते  फूलों मे ओस की बूदों में 
 बादलों के चेहरों में झरनों की लहरों में 
अमुआ की बौर में  झूमते  हुए मोर में

वीणा की तान में रागों के गान में 
बस तू ही सुनाई देती है 
सन्नाटों को चीरती कहीं दूर 
तेरी आवाजें सुनायीं देतीं हैं 
खामोश इस बंद चारदीवारी में 
तेरी धड़कने सुनाईं देती हैं 

तू स्वप्न है या मेरी परिकल्पना 
मेरी आस्था है या निश्चल भावना ?
नहीं तू, मेरी भावों की  बहती  सरिता है  
नैराश्य को दूर करती कविता है  
हर क्षण तेरी रश्मि निहारता हूँ 
बहना चाहता हूँ गुनगुनाना चाहता हूँ 
पर जितना तेरे करीब आता हूँ उतना ही दूर चला जाता हूँ।।

Monday, 3 June 2013

बरखा बहार आई



बदन को सिहराती हुई कंपकंपाती सी  ये बूँदें 
हृदय के तार झंकृत कर
भवरों के स्वरों से गुंजित
कुछ गुनगुनाती सी ये बूँदें।।

ये बूँदें ही तो हैं जो
सपनो को यौवन की गति से उडाती हैं
तितलियों को पुष्प से मिलातीं हैं
अंकुर को अंकुरित कराती हैं।।

परन्तु ,


एस़ी के अन्दर से तेरा एहसास ही नहीं होता
आज भीगना चाहता हूँ
ये सूट भीगने नहीं देता।
दौड़ना चाहता हूँ इस बारिश में
लैपटॉप चलने नहीं देता।।
सिर्फ फेसबुक पे फील कर रहा हूँ
ऐ बरखा ये कॉर्पोरेट तुझसे मिलने नहीं देता।।

Monday, 8 April 2013

बेनाम दर्द
















ऐ दर्द अब ठहर जा , बीते हुए लम्हे गुजर जा
चाह के भी मैं तुझको भूल नहीं पाता
खोया रहता हूँ तुझमे
पर तुझको  ढूँढ नहीं पाता
कैसा बेनाम दर्द है ये
एक खंडहर आशियाना है
आईना मेरा है रूह तेरी है
और अक्स भी तेरा ही नज़र आता है??