Saturday, 13 November 2021

दिल्ली सर्दी और तुम

 



तुम्हे याद है रब्बी का वो गीत 

दिल्ली की सड़कों पे बुलेट चलाते सुनते 

मिलते थे हम पुराने किले के पीछे 

सर्दियों में मूंगफली खाते और गिलहरियों को खिलाते 


याद है तुम्हे CP के उस पार्क में मेरा गिटार 

और कॉलेज के उन लड़कों का गाना 

 सर्दी की वो सारी दोपहरें मेरी बाहों में बिताना 

और शाम होते ही रीगल में सिनेमा देखकर 

आखिरी मेट्रो से घर जाना 


याद होगा तुम्हे हमारा पहला आलिंगन 

२५ दिसबर के  वो घने कोहरे में 

जिसने छुपा लिया था मेरे माथे की  पसीने की बूँदें को 

और सिहरा दिया था हमारे शरीरों को 


हौज़ ख़ास में हमारा घंटो जॉन मेयर को सुनना 

और तुम्हारा सिगरेट के हर कश के साथ 

डूब जाना शिवानी, इस्मत और अरुंधति की दुनिया में 

जहाँ तुम और भी खूबसूरत दिखती थी धुंध छटने के बाद 


अगर तुम पढ़ रही होगी इसे आज 

तो दिल्ली सर्दी  में अब नहीं है आज़ाद 

न ले सकोगे तुम सांस और जी सकोगी वो दुनिया 

नहीं भीग सकोगे इस काली धुंध में 

जहाँ न मेरी महक है न मौजूदगी न अहसास 


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