Sunday, 27 November 2016

जाड़े की धूप -लघु प्रेम कथा -2

हल्का हल्का कोहरा छटने लगा था।  सुबह के १० बज रहे होंगे। मैं चटाई लेके छत पे धूप सेंकने चल दिया था।  साथ में मेरा विविध भारती का पिटारा था।
मैंने ऊपर आसमान देखा तो दो तीन पतंगे एक दूसरे को काटने की होड़ में थीं।  आँख पे गमछा रखा , बनियान में आराम से धूप में लेट गया।
विविध भारती पे रफ़ी साहेब का गाना आ रहा था , चौदहवी का चाँद हो.. . आँखे बंद करने पे लाल रंग के गोले बन रहे थे। लग रहा था जिंदगी यही है।
माँ की आवाज़ आयी आके चाय और चूड़ा मटर ले जाओ , मैंने अनसुना कर दिया ,  फिर वही ऊपर आके मेरे ऊपर चिल्लाईं और नाश्ता रख दिया।

धूप बहुत हलकी थी , अगला गाना क्या हुआ तेरा वादा की फरमाईश गाज़ीपुर से हो चुकी थी।  मैंने आँख खोल के देखा तो गिलासा ने चांदमारा ( पतंग के प्रकार )को हुच्छक के काट दिया था , वो निरदुन्द आसमान में बह रही थी।  तभी बगल की छत पे तुम आती हो , मुझे देख के खिलखिला के हंस के वापस चली जाती हो।
गाना भी बदल गया इस बार ये रेशमी जुल्फे ये शरबती आँखें , तुम फिर दिखती हो इस बार बाल को झटकते हुए सुखाते हुए , मैं तुम्हे न देखने का नाटक करता हूँ गमछे के कपडे में से देखता हूँ , पानी की हलकी छीटें मेरे ऊपर भी आती हैं , पूरा तन झरझरा उठता है। तौलिये से बार बार तुम अपनी गीलीं जुल्फों को झाड़ रही हो जैसे कोई सूप फटकता है।

इस बार फिर माँ की आवाज़ आती है खाया की नहीं ? तुम अचानक से पीछे हट जाती हो , गाना बदल गया है कश्मीर की कली , तारीफ़ करूँ क्या उसकी जिसने तुम्हे बनाया।  मैं उठता हूँ चूड़ा मटर खाता हूँ , चाय की चुस्कियां लेने लगता हूँ।  माँ अब ऊपर आ गयीं हैं , अपने ढेर सारे काम लेके। मुझे मटर  छीलने को दे दिया है। तुम अब तिरछी नज़रों से देख रही हो मुझे , माँ ने देख लिया पूछा , अरे सरिता नाश्ता वाश्ता हो गया की नहीं।  हो गया आंटी जी , आज बाल धोये हैं वही सूखा  रही हूँ छत पे।  कौनसा शैम्पू लगाती हो , मैं तो परेशान हो गयी हूँ सर्दियों में बाल बहुत झड़ रहे हैं मेरे तुम  लड़कियों का ही कुछ ट्राई करती हूँ।

मैं तुम्हे देख रहा हूँ मटर छीलते हुए गाना बदल गया है मैं जिंदगी का साथ निभाता चला गया हर फिक्र को धुंए में उड़ाता। ....

Tuesday, 4 October 2016

यादें

ये यादें कम्भख्त छीन लेतीं हैं सारा चैन
निचोड़ के देखा तो भीग गया अंदर तक।

कुछ में तो ऐसा नशा था कि
लगा जैसे  चखा है  अभी अभी
चाय की वो चुस्कियां, ताज़ी हैं जेहन में
वो मुस्कुराहटें तुम्हारी , सरिता के तरह
बह रहीं थीं हृदय की हर धमनियों में

कुछ सूखी हुईं सी थी
नींद को कोसों दूर ले जानी वाली
 आंसुओं से भीगोने वालीं
बहती सरिता को झुलसा  देने वाली गर्मी की तरह
ये जरुरी हैं मुझे मेरी औकाद याद दिलाने के लिए


लेकिन कुछ यादें ऐसी थीं  जिनमे मैं
ठहर गया , समेट लिया उनमे खुद को
जैसे डुबकियां लगाईं हो इस शांत बहती सरिता में
तुम्हारे न होने का एहसास भी एक सुकून लाता है
इन्हीं यादों की वजह से

 वक़्त ठहरता है दोस्तों
इन्हीं यादों से इन्हीं यादों में
 हम  जीतें हैं बस इन्हीं यादों से
मरते भी बस  इनसे ही हैं !!

अंकुर 'बनारसी '



Friday, 29 January 2016

जश्न ऐ रोज़गार

आज फिर से खड़ा हूँ खामोश उसी साहिल पे 
जहाँ कभी दरिया हुआ करता था 
तुम आती थी अपने दुपट्टे को लहराते हुए 
हवा पे सवार हम बेफिक्री से उड़ा  करते थे 

मेरे मोबाइल के स्क्रीनसेवर पे तुम्हारा जिक्र था 
रिंगटोन भी कमबख्त रहमान की बेसुवादी रातों की थीं 
जानता था मैं की तुम अभी सोयी नहीं होगी 
फिर भी मैंने तुम्हारे सवाल का जवाब नहीं दिया !!

हाँ इश्क़ किया था मैंने तुमसे ही 
कश भी लगाये थे जो धुंए में उड़ गए 
बहारों का इंतज़ार भी किया था कांटो में बैठ कर 
पर सबकुछ खो दिया मैंने इस रोज़गार ऐ जश्न को मना कर !!
आज फिर से खड़ा हूँ खामोश उसी साहिल पे 
जहाँ कभी दरिया हुआ करता था !