सड़कों पे ७ बजे ही सन्नाटा छाने लगा है , ज्यादातर आने जाने वाले कोचिंग से लौटने वाले लड़के हैं जो अपनी साइकिलों लड़कियों के पीछे पीछे चल रहे हैं और सोचते हैं की जीवनसाथी मिल गया। मफलर पहने हुए मटरू दादा अभी भी मुरारी की दूकान पे बैठे हैं और रेडियो पे जयमाला कार्यक्रम सुन रहे हैं। मैंने उन्हें बोलते हुए सुना जड़वा साला फिर आ गएल जिनगी नरक बा , ऐ राजेसवा एक अद्धा ले के आओ रे।
पान की दूकान पे वही लोग मौजूद है जो कादंबरी हलवाई से दूध लेके लौट रहे हैं। मैंने सायकिल पे चलते हुए एक मनमोहक मदमस्त करने वाली ठंडक को महसूस किया और रोहितेश्वर मंदिर पे १०० ग्राम मूंगफली लेके खाने लगा। बगल में फूलचंद जी सब्जी बेच रहे हैं , हालाँकि अब खरीदार वो मजदूर हैं जो शाम को मजूरी कर के लौट चले हैं। फूलचंद जी की दुकान पे एक बहुत ही बढ़िया साइन बोर्ड लगा हुआ है " इधर से गुजरे जो नर नारी सबको सीताराम हमारी "
ये वही मूंगफली वाले हैं जिनसे पिताजी बचपन में १०० ग्राम मूंगफली लाते थे गरम गरम ५ रुपये की, आज मैंने १२ रुपये दिए। सबसे आनंद आता था जब मैं दो चार मूंगफलियां छिपा लिया करता था और सबके ख़त्म होने के बाद चिढ़ा के खाता था , हालाँकि माताजी फिर भी एक दो छोटे भाई को दिला देतीं थी। वाह क्या नवम्बर महीना होता था।
मैंने अस्सी जाने का मन बनाया संकटमोचन होते हुए। अगर आपको संकटमोचन का सही आनंद लेना है तो शाम या सुबह में आरती के समय जाइए , एकदम अलग राग में हनुमानाष्टक पढ़ते हैं और एक अलग ही माहौल होता है। संकटमोचन जाना बनारस की अदा नहीं आदत है और मंगलवार और शनिवार तो पूरा बनारस हनुमानभक्त रहता है , लेकिन ठण्ड में नंगे पाऊँ टाइल्स पे खड़े होकर आरती का आनंद अद्धभुत है।
वापिस मैं अस्सी की तरफ निकल पड़ा , तुलसी घाट पे सायकिल लगाई , हनुमान जी के छोटे से मंदिर पे प्रणाम किया। मंदिर के पीछे से ८४ घाटों का अद्धभुत दृश्य और माँ गंगा पे रौशनी का प्रतिबिम्ब , आप विश्वास नहीं करेंगे , ये लिखते हुए मेरे रौंगटे खड़े हो रहे हैं ठण्ड में ये दृश्य विहंगम होता है। सुनसान घाटों पे दूर से जय सिया राम जय जय सिया रामा सुनायी दे रहा है और एक साधू बाबा निर्गुण गाते हुए गुजर रहे हैं " नैहरवा हमका न भावे , साईं की नगरी परम अति सुन्दर , जहाँ कोई जाए न आवे , तपन यहाँ जिया की बुझावे , नैहरवा। .......... "
मैं कुछ देर सबकुछ भूल के वहीँ बैठ गया और कबीर का यही निर्गुण गुनगुनाने लगा। किसी ने सही ही कहा है
" काशी कबहुँ न छोड़िये विश्वनाथ दरबार "
मेरी आँख खुल गयी , अलार्म में रॉक म्यूजिक बज रह था , मैं नौकरी पे जाने के लिए देर हो चूका था और अपनी जिंदगी से दूर बहत दूर काशी को कबका छोड़ चुका था।
आपको छोड़े जा रहा हूँ उसी निर्गुण के साथ।