बदन को सिहराती हुई कंपकंपाती सी ये बूँदें
हृदय के तार झंकृत कर
भवरों के स्वरों से गुंजित
कुछ गुनगुनाती सी ये बूँदें।।
ये बूँदें ही तो हैं जो
सपनो को यौवन की गति से उडाती हैं
तितलियों को पुष्प से मिलातीं हैं
अंकुर को अंकुरित कराती हैं।।
परन्तु ,
एस़ी के अन्दर से तेरा एहसास ही नहीं होता
आज भीगना चाहता हूँ
ये सूट भीगने नहीं देता।
दौड़ना चाहता हूँ इस बारिश में
लैपटॉप चलने नहीं देता।।
सिर्फ फेसबुक पे फील कर रहा हूँ
ऐ बरखा ये कॉर्पोरेट तुझसे मिलने नहीं देता।।

Man ki baat Pandey ji.... Sundar
ReplyDeleteaakhir ki panktiyan atyant hi sundar hain..
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