14 जनवरी हर बनारसी के लिए खास होता है और मैं कोई अपवाद नहीं, वो जाड़े की
ठंडक , फिर भी सुबह जल्दी उठाना, तुरंत नहाना ( ये मेरे लिए एक अपवाद होता
था जाड़ों में पर माँ के डर से इस दिन जरुर नहाते थे वरना पतंग उड़ाने की
मंजूरी नहीं मिलती थी।)..नहाने के बाद मटर की सलोनी ताज़ी धनिया की खुशबु के
साथ, भुना हुआ चूड़ा, तिल के लडडू , मूंगफली की पट्टी, रामदाने का स्वाद ,
और सबसे ख़ास पतंग,
एक कटी पतंग की कीमत एक रुपये कभी नहीं होती ये एक पतंग बाज जानता है, कटी पतंग को लूटने का जो आनंद है वो अभूतपूर्व है, संक्रांति के दिन अरी रजा भाक्काते का शोर अगर नहीं मचाया तो शुभ नहीं।
एक कटी पतंग की कीमत एक रुपये कभी नहीं होती ये एक पतंग बाज जानता है, कटी पतंग को लूटने का जो आनंद है वो अभूतपूर्व है, संक्रांति के दिन अरी रजा भाक्काते का शोर अगर नहीं मचाया तो शुभ नहीं।
एक सच्चा पतंगबाज जनता है की उसकी सारी कला की परीक्षा इसी दिन होती है, किसने कितने पेच लडाये , कितनी सफलता मिली, ये सब मेरे दिल और दिमाग में घूमता रहता था।
सबसे खास होता था किसी कटी पतंग की डोर नोच लेना जिसे हम देसी भाषा में हथ्हा नोचना कहते थे।। खिचड़ी के एक दिन पहले ही सारी पतंगों में कन्ना बाँध लेना , परेता में पूरा सद्दी , और मंझा से लैस तैयार रहता था मैं 14 जनवरी के लिए।।
पर ये तो इतिहास हो चुका है अब मेरे लिए, कल 14 जनवरी है , मेरे अन्दर कोई जूनून नहीं , कोई आनंद नहीं, घर से हज़ारों किलोमीटर दूर, एक 3 BHK फ्लैट के एक कमरे में लैपटॉप के सामने एक PPT तैयार कर रहा हूँ, कल ऑफिस जाना है , बॉस जी को उनके प्रॉफिट के बारे में बताना है , गुड़ , पट्टी, ढूंडा , और पतंग ये शब्द कोई अर्थ नहीं रखते , जाड़े का नामोनिशान नहीं है, सूरज उत्तरायण हो रहा है पर मेरे लिए मेरा ऑफिस वही दक्षिणायन पे है।।
कुछ लोग गन्ना जरुर बेच रहे हैं पर मेरे दांत इतने मजबूत नहीं की उन्हें खा सकूँ, हर जगह की अपनी परम्पराएं होती हैं, पर कॉर्पोरेट जगत की एक ही परंपरा है लाभ , मैं कॉर्पोरेट जगत में हूँ , मैं सफ़ेद कालर नौकरी करता हूँ, फर्राटा अंग्रेजी बोलता हूँ, बरिस्ता में कॉफ़ी पीता हूँ, आरामदायक गाडी में चलता हूँ, अमेरिका यूरोप के लोगों से बातें करता हूँ , सबके लिए मैं एक बिकने लायक सामान हूँ, जिसने अच्छी बोली लगाई मैं उसका हो गया , आज इस कंपनी में हूँ , कल दूसरी में मिलूँगा, आज बरिस्ता में तो कल जॉर्जिया में कॉफ़ी पीयूँगा, लेकिन 14 जनवरी का असली आनंद से मेरा कोई वास्ता नहीं, महा कुम्भ मेले से मेरा कोई वास्ता नहीं, खुद से मेरा कोई वास्ता नहीं, सूर्य के उत्तरायण से मेरा कोई वास्ता नहीं कोई अनुभूति नहीं , एयर कंडीशनर में जो रहता हूँ, मैं कॉर्पोरेट एम्प्लोयी हूँ। क्या मैं बनारसी हूँ??
संक्रांति की शुभकामनाएं।।

I got goosebumbs Pandey ji....Essentially need a Hot nd Strong Barista coffee...:)
ReplyDeletePar ek cheez aap bhul gaye...paani ki tanki pe chadh ke patand kaatne waale ko abuse karna was my fav part !!
Wo censored hai, banaras me hum ek rhyme se gaali dete hain,:)
ReplyDeleteNoone can match ur Patangbagi..true sarcasm to d way we hv transformed ourself:-|gud one:-)
ReplyDeletegood one boy !!
ReplyDeletekitni hassi zindgi thi wo ......
Beautiful expression Ankur. I was able to relate all your joys in Varanasi as I was going through the lines. Seriously, the flip-side of one's life and the materialistic world can never give you that pleasure. It was truly precise and crisp with the suppressed emotions oozing out. A true "desi" like me can understand.
ReplyDeleteYou are good at writing. Keep sharing!! All the Best.
भावनाओं को बहने दो ... एक नदी कि तरह .. कभी स्थिर नहीं रहती . परिवर्तन जीवन कि अटूट परंपरा है, और परिवर्तन का मुख मोड़ने कि क्षमता तुममे है ...
ReplyDeleteबहो, कुछ ऐसे बहो जैसे कोई नैया बहती है , जिसका खिवईया स्वयम नारायण हैं, और जिसके चाप स्वयम तुम !!
pandey ji,
ReplyDeletebahut bahut khub likha aapne...man man unmaad utappan ho gaya..
banaras ki yaadein taaja karane ke liye dher sara dhanyawad!!!
गौरव जी, बनारसी होने का जो आनंद है वो सिर्फ एक पक्का बनारसी ही समझ सकता है, आपको पढ के बनारस का आनंद मिला , बस लिखना सफल हुआ, धन्यवाद।।
ReplyDeleteमहादेव।
Hattha nochne waale tum jaise logon ne hi patangbazi jaise pavitra karya ko kalankit kiya hai......... "Hattha nochne walon ...janata maaf nhe karegi"
ReplyDeleteJai Hind!
Chinese Manjhe ne aisi ki taisi kar di
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