दरवाजा खोला तो रात फिर खड़ी थी
दिन बीत गया था और आस डूब गयी थी
मैं फिर से हार गया था और किस्मत जीत गयी थी!!
मैंने सोचा क्यूँ न इस अंधियारे को ही अपना लूं
खुद को खुद से दूर ले जाकर सन्नाटों में घर बसा लूँ
आखिर किया ही क्या है मैंने जो तू हर पल दस्तक देती है
मेरी तन्हाई और मेरे सपनो को तोड़ कर झूम लेती है!!!!
तेरे सन्नाटे को ही चादर बना के ओढ़ लिया है
और गम को आंसू बना के पी लिया है....
अब सिर्फ मैं हूँ और ये टूटा आइना
जिसमे मेरा अक्स है पर है न कोई आत्मा......

Benarsi albele!! bahut khoob!! :)
ReplyDeletereflects a lot of my feelings as well :) :)
Thnx Kaushik....:)
Deletebahot achhe...achhi shuruaat...shabdo ka achha upyog... :)
ReplyDeleteGood one:)
ReplyDeleteतेरे इन शब्दों में , अक्स अपना नज़र आता है !
ReplyDeletereally deep one :)
ReplyDeletenice bhayia!
Kya baat... Good One..
ReplyDeleteGood one Ankur. Keep it up
ReplyDeleteजिसमे मेरा अक्स है पर है न कोई आत्मा..
ReplyDeleteAhhh....Bahut hi umda!!