तुम्हे याद है रब्बी का वो गीत
दिल्ली की सड़कों पे बुलेट चलाते सुनते
मिलते थे हम पुराने किले के पीछे
सर्दियों में मूंगफली खाते और गिलहरियों को खिलाते
याद है तुम्हे CP के उस पार्क में मेरा गिटार
और कॉलेज के उन लड़कों का गाना
सर्दी की वो सारी दोपहरें मेरी बाहों में बिताना
और शाम होते ही रीगल में सिनेमा देखकर
आखिरी मेट्रो से घर जाना
याद होगा तुम्हे हमारा पहला आलिंगन
२५ दिसबर के वो घने कोहरे में
जिसने छुपा लिया था मेरे माथे की पसीने की बूँदें को
और सिहरा दिया था हमारे शरीरों को
हौज़ ख़ास में हमारा घंटो जॉन मेयर को सुनना
और तुम्हारा सिगरेट के हर कश के साथ
डूब जाना शिवानी, इस्मत और अरुंधति की दुनिया में
जहाँ तुम और भी खूबसूरत दिखती थी धुंध छटने के बाद
अगर तुम पढ़ रही होगी इसे आज
तो दिल्ली सर्दी में अब नहीं है आज़ाद
न ले सकोगे तुम सांस और जी सकोगी वो दुनिया
नहीं भीग सकोगे इस काली धुंध में
जहाँ न मेरी महक है न मौजूदगी न अहसास
