वो तुलसी घाट की सीढ़ियों पे नीम्बू की चाय
और पीपल के पेड़ के नीचे गंगाजी की हवाएँ
मेरी डूबती सी मोहब्बत और वो चिलम का उठता धुआं
यार बनारस , तुम फिर याद आने लगे हो !
वो बौराये से आम और गरबैठि सी बेर
शिवरात्रि के धतूरे और पिसी हुई भांग
वो काशी का अस्सी और रामनगर की लस्सी
अरे हाँ बाबा की ठंडई और हमारी लंठई
यार बनारस , तुम फिर याद आने लगे हो !
वो मसाने की होरी और हम लखेरो की टोरी
वो गरियाते हुए हमारा केशव का पान
ख़त्म हो रही मलइयो और छन्नूलाल की तान
मुझे याद आ रही है गिरिजा की कजरी महान
वो रात के सन्नाटे में चांदनी की आवाज़
और बदन पे लपेटे अघोरी राख
महा शमशान का वो असली बैराग!
यार बनारस , तुम फिर याद आने लगे हो !
यार बनारस , तुम फिर याद आने लगे हो !