मैंने हमारे बीच हमेशा एक ख़ामोशी बना रखी। इसी ख़ामोशी के कारण तुम मेरे पास आती थी। वो तुम्हे कहीं और नहीं मिलती थी। धीरे धीरे मैं और खामोश होता चला गया ताकि हमारे बीच सबकुछ सहज हो। हम मिलते ही खामोश हो जाते थे। सब सही हो जाता था। लेकिन , मैं जानता था , दुनिया का शोर कहाँ हमे खामोश रहने देगा। इसिलए मैंने तुम्हे एक धुन बना दिया , गुलज़ार की लिखी हुई कोई नज़्म और बर्मन का संगीत। अब मैं हमेशा के लिए खामोश हूँ , तुम्हारी धुन है बस। तुमने शोर चुन लिया , मैंने ख़ामोशी।