बनारस अब तुम रात के २ बजे ज्यादा खूबसूरत लगते हो। धूआं और धूल ,चिलम के उठते गुबार में कहीं खो सा जाता है। तुम्हारी रूह तक पहुंचने का रास्ता अब इन्हीं खाली रास्तों से होकर गुज़रता है। सोडियम लैंप तुम्हारी आत्मा तक पहुंचने में सूरज से ज्यादा कारगर साबित हो रहे हैं । तुम्हारी रूह से उठता हुआ वो धुआं , मुझे बेबस पुकारता है , मुझे सन्नाटे का यही शोर पसंद है। क्यूँकि दूर कहीं मणिकर्णिका की प्रज्वलित अग्नि , और माँ गंगा से बेबस उठती वो लहरें मुझे मेरे होने का एहसास दिलाती हैं। मैं मणिकर्णिका को इसी समय महसूस करता हूँ। एक दिन तो आना ही है , पर तब महसूस न होगा , वो गंगा स्नान , और शून्य में विलीन होना। यही तुम्हारा सबसे ख़ास एहसास है , जो कहीं नहीं मिलता। बनारस तुम रात में जीते हो और दिन में मरते हो। बहुत थक के चूर होने के बाद की गहरी नींद का जो एहसास है , वो दिलाते रहना। मैंने खुद को छोड़ दिया है तुम्हारे आस पास उस एहसास पे , जहाँ महा शिवरात्रि की घनघोर रात दूर कहीं उस छोटे से मंदिर में वो अकेला गंजेड़ी जय सिया रामा की रट लगाए हुए है।