रात के हर खाने के बाद
बिजली के गुल होने पर
दादी या बड़ी माँ के घर पे होने पर
लकड़सुंघवा तुम आते थे।
तुम्हारे आने के ख्याल से
कांपते थे ह्रदय और हम
कर देते थे वो हर काम
जो माँ कहा करती थी।
तुम्हारे खौफ से न जाने
कितने कौर खिला देती थी माँ
भाग के जल्दी घर आ जाते थे शाम को खेल के
और हर वो आदमी जो अचानक गायब हो जाता था
उसे उठा ले जाते थे तुम
बड़ी आसानी से सुला देते थे तुम हम सबको
मुझे मिलना है तुमसे
फिर से डरना है तुमसे
बहुत याद आती है तुम्हारी
और माँ के हाथ के वो कौर खाने हैं
सोना है सुकून से।