Saturday, 21 October 2017

द सिन्दबाज़ पतंगबाज़

आज भी मैं जब भी कभी अपने घर की छत पर जाता हूँ , निगाहें एक बार पूरी छत पर सिर्फ यही देखती हैं, की कहीं कोई  कटी पतंग तो नहीं आयी है।
एक बार ऊपर आसमान जरूर देखता हूँ की कहीं कोई पेंच तो नहीं लड़ रहे। कुछ देर के लिए मेरी जिंदगी ठहर सी जाती है  बस ये सोच के , की मेरी जिंदगी  का सबसे बड़ा मकसद शायद कालोनी की हर उड़ती पतंग  को काट देना था।  वो एक भ्रम था , मैं इतना बड़ा पतंगबाज़ कभी था ही नहीं।  मेरी 40 % पतंगे आराम से काट जातीं थी।  लेकिन आज भी मुझे उड़ती पतंगे देखना बहुत पसंद है , किस पतंगबाज़ ने  क्या गलती की , ये मैं चुटकियों में समझ लेता हूँ।  कटी हुई पतंगों को लूटना या लूटते हुए देखना भी शायद वर्ल्ड कप जीतने जैसा है। हारे हुए लड़कों की झुंझलाहट और उनका गुस्सा आज भी बरक़रार है।  मैं इसी तरह हारता ही रहता था , और फ्रस्टियाता रहता था। पतंग भी अजीब चीज़ है , कटने के बाद उसी के घर में जाती थी जिसको उसकी कोई ज़रूरत नहीं।  मेरी झूठी शालीनता से  कई बार कालोनी के अंकल आंटी मुझे वो पतंग दे दिया करते थे या कई बार भगा देते थे।
 

मैं अब घर में नहीं कमरे में रहता हूँ , और आज भी शायद अपनी जिंदगी में औसत ही कर रहा हूँ , 60 % से थोड़ा ज्यादा ही अब भी हार जाता हूँ। मैं रोज़ अपनी जिंदगी से पेंच लड़ाता हूँ , ज्यादातर असफल ही रहता हूँ।  जिंदगी से जंग  एक आदत सी बन गयी है।  आज भी कई बार सफलता उन्हें मिलते देखता हूँ जो शायद उसे ज्यादा तवज़्ज़ो नहीं देते। मुझे दूसरों की जंग देखना ज्यादा अच्छा लगता है , क्यूंकि मुझे पता रहता है वो क्यों जीता या फिर हारा।  हारते हुए गिरना और फिर से नए जोश के साथ जंग लड़ते देखना मुझे सबसे ज्यादा पसंद है। मैं एक पतंगबाज़ था , मैं एक सिंदबाद हूँ।