Saturday, 30 December 2017

मैं बनारसी हूँ लेकिन







हाँ मैं तुम्हारे पास आना चाहता हूँ

लेकिन तुम्हारी हवा में
सांस लेने से डर  लगने लगा है |  

शोर के बाज़ार में घंटों जाम 
सुकून से दूर हर तरफ सिर्फ दूकान ही दूकान। 
अस्सी से दूर जाती माँ गंगा 
और उनमे शौच करते लोग |

घाटों के किनारे धोबी और साबुन के झाग 
बदबू मारते शौच  और पेशाब की महक 
गलियों और सडकों पे अनगिनत गोवंश 
कूड़े के ढेर में प्लास्टिक खाती गायें 
माँ गंगा आरती में लूटते हुए पंडे 
और BHU में घूमते हुए गुंडे 
ना नौकरी सिर्फ भौकाल 
कोचिंग सेंटरों का मायाजाल 

लेकिन मैं आना चाहता हूँ फिर भी 

क्यूंकि गुड़्डू की चाय नहीं बदली है 
ना ही वो पतंग गली और महाशमशान
कचौड़ी -जलेबी -लौंगलता और मलइयो यहीं पर हैं  
और केदार घाट का सूर्योदय तुम्हारा अभिमान है 
ठंडाई अभी भी प्रसाद और महादेव का निवास है
काल भैरव कोतवाल और संकटमोचन हनुमान हैं 

कबीरी फकीरी तुम्हारी फ़िज़ा में बरक़रार है  
अरे , मेरी जन्मभूमि तुम ही तो हो बनारस। 









Saturday, 21 October 2017

द सिन्दबाज़ पतंगबाज़

आज भी मैं जब भी कभी अपने घर की छत पर जाता हूँ , निगाहें एक बार पूरी छत पर सिर्फ यही देखती हैं, की कहीं कोई  कटी पतंग तो नहीं आयी है।
एक बार ऊपर आसमान जरूर देखता हूँ की कहीं कोई पेंच तो नहीं लड़ रहे। कुछ देर के लिए मेरी जिंदगी ठहर सी जाती है  बस ये सोच के , की मेरी जिंदगी  का सबसे बड़ा मकसद शायद कालोनी की हर उड़ती पतंग  को काट देना था।  वो एक भ्रम था , मैं इतना बड़ा पतंगबाज़ कभी था ही नहीं।  मेरी 40 % पतंगे आराम से काट जातीं थी।  लेकिन आज भी मुझे उड़ती पतंगे देखना बहुत पसंद है , किस पतंगबाज़ ने  क्या गलती की , ये मैं चुटकियों में समझ लेता हूँ।  कटी हुई पतंगों को लूटना या लूटते हुए देखना भी शायद वर्ल्ड कप जीतने जैसा है। हारे हुए लड़कों की झुंझलाहट और उनका गुस्सा आज भी बरक़रार है।  मैं इसी तरह हारता ही रहता था , और फ्रस्टियाता रहता था। पतंग भी अजीब चीज़ है , कटने के बाद उसी के घर में जाती थी जिसको उसकी कोई ज़रूरत नहीं।  मेरी झूठी शालीनता से  कई बार कालोनी के अंकल आंटी मुझे वो पतंग दे दिया करते थे या कई बार भगा देते थे।
 

मैं अब घर में नहीं कमरे में रहता हूँ , और आज भी शायद अपनी जिंदगी में औसत ही कर रहा हूँ , 60 % से थोड़ा ज्यादा ही अब भी हार जाता हूँ। मैं रोज़ अपनी जिंदगी से पेंच लड़ाता हूँ , ज्यादातर असफल ही रहता हूँ।  जिंदगी से जंग  एक आदत सी बन गयी है।  आज भी कई बार सफलता उन्हें मिलते देखता हूँ जो शायद उसे ज्यादा तवज़्ज़ो नहीं देते। मुझे दूसरों की जंग देखना ज्यादा अच्छा लगता है , क्यूंकि मुझे पता रहता है वो क्यों जीता या फिर हारा।  हारते हुए गिरना और फिर से नए जोश के साथ जंग लड़ते देखना मुझे सबसे ज्यादा पसंद है। मैं एक पतंगबाज़ था , मैं एक सिंदबाद हूँ।

Monday, 10 April 2017

चालू यात्रा वृतांत - वो यादगार सफर

 ट्रेन के सफर में ,आजकल मुझे काफी मौके मिलते हैं चालू ( General ) श्रेणी में चलने के। ये एक अध्भुत अनुभव होता है। इसमें जो बात है वो जहाज के बिज़नेस क्लास में भी नहीं।  सबसे ख़ास बात जिस ट्रेन में मन करे चढ़ जाईये , और ऐसे लोगो से आपकी मुलाक़ात होगी की सफर पता नहीं चलेगा।  बस दिक्कत होती है तो शौचालय जाने में आप उसके आस पास भी नहीं फटक  सकते , और हाँ कोच भी अध्भुत महकता रहता है , इसके लिए दोष मैं  जनता को दूंगा ना की सरकार को।

बहरहाल इस बार मैंने सारनाथ एक्सप्रेस पकड़ी ४०किमी दूर जाना था , तो चालू कोच में चढ़ गया दौड़ते हुए , याद रहे चालू में सीट पाना एक कला है और ये आपको अनुभव से ही आ सकती है।  मुझे  सीट मिल गयी और बगल में दो अधेड़ उम्र के लोग आके बैठे।  उनमे से एक जिसका रंग गेहुआं आँखें बड़ी बड़ी और चमकदार शर्ट पहनी हुई थी बोला , वाह सीट मिल गयी अब रायपुर तक आराम से जाऊँगा। मैं अभी चुप बैठा था।
तभी अचानक उसने चिल्लाया हे भगवान् मेरी जेब किसी ने  काट ली, और आस पास शंका और उत्सुकता का माहौल बन गया। ट्रेन चल पड़ी और उस व्यक्ति की आँखें सब कुछ बयां कर रही थीं।  उसने किसी को कह के अपना ATM ब्लॉक करने का प्रयास किया और कहा सब कमाई उसी में है , चोर सब ले गया , मेरे पास बस एक रुपया है , और उसकी आँखें भर आयीं। मैं चुप चाप सब देख रहा था , एक शंका के साथ की कहीं कोई गिरोह न हो या कुछ धोखा जो की सामान्य है आजकल।  दो तीन स्टेशन गुज़र गए ,  और मैं उसकी आँखें देख रहा था , उसमे मोटे मोटे आंसू थे जो बह नहीं पा रहे थे।  लोग उसी को कोस रहे थे , क्यों रखा पीछे की जेब में वगैरह वगैरह। वो शायद कोई साधारण कर्मचारी था और उड़ीसा में किसी तरह पैसे जोड़े थे।  बोला रायपुर से उड़ीसा जाना है और सारे पैसे टिकट सब चला गया है। हे भगवन मेरा ATM बचा लो और किसी तरह रायपुर पंहुचा दो साड़ी कमाई उसी में है।

करीब आधे घंटे  बाद मैं बोला , एटीएम ब्लॉक हुआ ? वो बोला नहीं।  मैंने उसे बैंक का टोल फ्री  नंबर दिया  और उसे ब्लॉक करवा दिया। उसे थोड़ा सुकून मिला , मेरा स्टेशन आने वाला था ,  दोपहर की चिलचिलाती गर्मी थी , उसके पास एक रुपया था  और उसे 18 घंटे यात्रा करनी थी। भूखा और प्यासा वो दुखी बैठा था।  मेरा स्टेशन आ ही गया था , मैंने उसे कुछ पैसे दिए बोला  रख लो कुछ तो काम आ जायेगा ( मै ऐसा कभी नहीं करता हूँ और थोड़ा स्वार्थी आदमी हूँ ) वो बोला बिलकुल नहीं भैया , मैं बिना टिकट जेल चला जाऊँगा लेकिन पैसे नहीं लूंगा , आस पास वाले भी बोले  ले लो , पर वो मना करने लगा। फिर  मैंने कहा इतने पैसों का मेरा मोबाइल रिचार्ज  करवा देना।  उसने पैसे ले लिए और एक गज़ब की संतुष्टि हम दोनों को थी।  मैं अपने स्टेशन पर उतर गया।

करीब  चार दिन बाद मेरे पास एक फ़ोन आया , बोला भैया आपने जो पैसे दिए थे वो मेरे लिए 1  लाख रुपये के बराबर थे।  मैं उड़ीसा पहुंच गया हूँ और आपका आभारी हूँ , रिचार्ज करवा दे रहा हूँ , आप मेरे लिए भगवान् की तरह आये थे।  मैं थोड़ा भावुक हुआ और सोचा , मैं भी तो उस स्थिति में हो सकता था।  एक इंसान ही इंसान के काम आता है।

ये अनुभव मैं अपना गुणगान करने के लिए नहीं साझा किया , ये बताने के लिए कहीं न कहीं इस भाग दौड़ वाली जिंदगी में हमे आस पास देखना चाहिए और यदि संभव है तो किसी जरूरतमंद की हर संभव सहायता करनी चाहिए, लोगों से बात करनी चाहिए आमने सामने, और व्हाट्सअप और फेसबुक को थोड़ा विराम  देना चाहिए ।  ये हमने बचपन में सुना पढ़ा देखा है , पर कहीं न कहीं भूलने लगे हैं।
मुझे जो संतोष का अनुभव हुआ वो मैं  आपको बयां नहीं कर सकता।  जीवन का आनंद लीजिये।