आज फिर से खड़ा हूँ खामोश उसी साहिल पे
जहाँ कभी दरिया हुआ करता था
तुम आती थी अपने दुपट्टे को लहराते हुए
हवा पे सवार हम बेफिक्री से उड़ा करते थे
मेरे मोबाइल के स्क्रीनसेवर पे तुम्हारा जिक्र था
रिंगटोन भी कमबख्त रहमान की बेसुवादी रातों की थीं
जानता था मैं की तुम अभी सोयी नहीं होगी
फिर भी मैंने तुम्हारे सवाल का जवाब नहीं दिया !!
हाँ इश्क़ किया था मैंने तुमसे ही
कश भी लगाये थे जो धुंए में उड़ गए
बहारों का इंतज़ार भी किया था कांटो में बैठ कर
पर सबकुछ खो दिया मैंने इस रोज़गार ऐ जश्न को मना कर !!
जहाँ कभी दरिया हुआ करता था
तुम आती थी अपने दुपट्टे को लहराते हुए
हवा पे सवार हम बेफिक्री से उड़ा करते थे
मेरे मोबाइल के स्क्रीनसेवर पे तुम्हारा जिक्र था
रिंगटोन भी कमबख्त रहमान की बेसुवादी रातों की थीं
जानता था मैं की तुम अभी सोयी नहीं होगी
फिर भी मैंने तुम्हारे सवाल का जवाब नहीं दिया !!
हाँ इश्क़ किया था मैंने तुमसे ही
कश भी लगाये थे जो धुंए में उड़ गए
बहारों का इंतज़ार भी किया था कांटो में बैठ कर
पर सबकुछ खो दिया मैंने इस रोज़गार ऐ जश्न को मना कर !!
आज फिर से खड़ा हूँ खामोश उसी साहिल पे
जहाँ कभी दरिया हुआ करता था !