मन के पतंग कि डोर बस तेरे ही ओऱ जाती है
ये बसंती हवा बस तेरा ही एहसास दिलाती है
दूर कहीं किरणो के आने कि आहट है
सन्नाटों को चीरती कोयल कि कूक
पल प्रतिपल तुझे पुकारती है
ये सवेरा है
वो देखो सामने प्रस्फुटित हो गया प्रत्युष
सरिता पे नव अंकुरित भास्कर
आह! इसे देख के बस तुम ही याद आते हो
गुलाबी ठंडक के गुलाब
तुम बहुत याद आते हो !!
