Thursday, 24 October 2013

गुलाबी ठंडक के गुलाब


मन के  पतंग  कि डोर बस तेरे ही ओऱ जाती है 
ये बसंती  हवा बस तेरा ही एहसास दिलाती है 
दूर कहीं किरणो के आने कि आहट  है 
सन्नाटों को चीरती कोयल कि कूक 
पल प्रतिपल तुझे पुकारती है 

ये सवेरा है  

वो देखो सामने प्रस्फुटित हो गया प्रत्युष 
सरिता पे नव अंकुरित भास्कर 
आह! इसे देख के बस तुम ही याद आते हो 
गुलाबी ठंडक के गुलाब 

तुम बहुत याद आते हो !!