Monday, 3 June 2013

बरखा बहार आई



बदन को सिहराती हुई कंपकंपाती सी  ये बूँदें 
हृदय के तार झंकृत कर
भवरों के स्वरों से गुंजित
कुछ गुनगुनाती सी ये बूँदें।।

ये बूँदें ही तो हैं जो
सपनो को यौवन की गति से उडाती हैं
तितलियों को पुष्प से मिलातीं हैं
अंकुर को अंकुरित कराती हैं।।

परन्तु ,


एस़ी के अन्दर से तेरा एहसास ही नहीं होता
आज भीगना चाहता हूँ
ये सूट भीगने नहीं देता।
दौड़ना चाहता हूँ इस बारिश में
लैपटॉप चलने नहीं देता।।
सिर्फ फेसबुक पे फील कर रहा हूँ
ऐ बरखा ये कॉर्पोरेट तुझसे मिलने नहीं देता।।