Tuesday, 26 March 2013

होली थी !!!


कब है होली ? ये सुनते ही गब्बर याद आता है, कल जब एक कन्नडिगा  मित्र ने पूछा तो एहसास हुआ अरे एक और त्यौहार एक  और अद्भुत स्मृति और भावनाएं मुझसे काफी दूर जा चुकी हैं ..
होली सिर्फ एक त्यौहार नहीं , बनारसी के लिए जबरदस्त उत्साह , उमंग और सबसे खूबसूरत भाव है,
शुरुआत तो काफी महीनो पहले से हो जाती है जब दुनिया भर के कूड़ा , पेड़ , पौधा काट के होलिका लगाना शुरू होता था , जो मिला झोंक दो साला सब जल जायेगा ....एक दिन पहले लिजुरी (उपटन) छुड़ाई जाती थी ( सरसों का पेस्ट ) ..लगता था मैं कितना गोरा हो  गया हूँ , और फिर उसे भी झोंक देता था होलिका में ये सोच के की बुरे का नाश हो गया और मैं फिर से संत बन गया।।
 मुझे याद आता है तीन चार दिन पहले से ही मैं माँ  से पूछने लगता गुझिया कब बनेगी, लड्डू कब बनेगा , ये वाला लड्डू क्यूँ नहीं बना रही, वो नमकीन  ये नमकीन बड़ा और न जाने क्या क्या .पर वो सबकुछ बनातीं थीं और मैं मस्त होके  अपना निर्णय देता था ये कम है ये ज्यादा ...बस खाता रहता खाता रहता ...
होली की सुबह आठ बजते ही माँ वेसिलीन की आधी डिबिया मेरे चेहरे पर लगा देतीं थीं ( थोप देतीं थी ) रंग से बचाने के लिए,
सबसे फटी पुरानी शर्ट को पहन कर मैं इंतज़ार करने लग जाता था अपनी टोली का , मुझे बिना निराश किये वो जल्दी से प्रकट होते थे , और फिर होता था घमासान ,
कॉलोनी का कोई लड़का बचने न पाए , कोई रोड छूट  न जाये , हर कोई लाल नीले रंग पे पुता होना चाहिए, कहीं कहीं किस्मत अच्छी रहती तो गुझिया भी  खाने को मिल जाती थी।
होली में हमारे मुख्य शत्रु वे अंकल के घर होते जो हमे क्रिकेट की गेंद घर में जाने पे नहीं लौटते थे, वो बच्चे जो काफी हीरो बनते थे उनका विशेष स्वागत किया जाता था ....फगुआ के बारे में मेरी जानकारी थोड़ी कम थी तब पर कानो में फटीचर भोजपुरी गाने सुनाई देते रहते थे ...
हर उम्र वालों की अपनी टोली थी।।बड़े , बुजुर्ग , जवान , लड़के और आंटी ...
.दोपहर होते होते थकान अपने चरम पर  होती थी , खेलने से ज्यादा रंग छुड़ाने के कारण , और उस समय जो खाना माँ खिलाती थी वो अमृत से कम न होता , पूरी इत्यादी व्यंजनों से सुसस्जित अध्बुत थाली ....

फिर शुरू होता तीसरा चरण जो लम्बा चलता हफ्तों चलता  , हर व्यक्ति एक दूसरे के घर जाता , टीका लगाता ( इतना रंग खेलने के बाद पता नहीं इसकी क्या जरुररत ) गुझिया आदि बेहतरीन पकवान और फिर दुसरे घर पे चलके वही पकवान ...पकवान पकवान टीका टीका ....

सबसे खुबसूरत बातें जो मैं महसूस करता था , परीक्षाएं लगभग खत्म हो जाती थीं , और मौसम में हलकी गर्मी का गज़ब एहसास होता था , आम में बौर आ जाता था , हर तरफ एक उमंग महसूस होती थी ...दिमाग में सिर्फ खेलना और खेलना ...
फिलहाल अभी अभी ऑफिस से आया हूँ, कुछ जगह पिचकारी की दुकाने देखीं , पर खाली ही थीं, कल होली है इसका कोई एहसास दूर दूर तक नहीं है , छुट्टी भी नहीं है और मालिक कहें हैं काम पे जरुर आना है , न कोई होलिका है न कोई लिजुरी ...ना कोई उमंग न तरंग, लोग भाग रहे हैं, कोई टेस्टिंग कर रहा है कोई डेवेलोप , कोई बिज़नस प्लान बना रहा है .......
 फिर भी यही आशा करता हूँ की जो भी इस त्यौहार को मना रहें हैं पूरे उत्साह और उमंग से मनाये ...जीवन में नयी उमंग एवं आशाओं का संचार करें ...
अब मुझे फगुआ और ठुमरी जरुर अच्छी लगती है ..जाते जाते आपको छोड़े जा रहा हूँ उस होली गीत के साथ जो मुझे सबसे ज्यादा पसंद है, पंडित जी की बेहतरीन आवाज़ और काशी में भोलेनाथ की होली , इस पर भी चर्चा करेंगे फिर कभी ...होली की शुभकामनायें।।।