मन के पतंग कि डोर बस तेरे ही ओऱ जाती है ये बसंती हवा बस तेरा ही एहसास दिलाती है दूर कहीं किरणो के आने कि आहट है सन्नाटों को चीरती कोयल कि कूक पल प्रतिपल तुझे पुकारती है
ये सवेरा है वो देखो सामने प्रस्फुटित हो गया प्रत्युष सरिता पे नव अंकुरित भास्कर आह! इसे देख के बस तुम ही याद आते हो गुलाबी ठंडक के गुलाब तुम बहुत याद आते हो !!
आँख खुलना नहीं चाह रही थी पर मैंने अपने ही हाथो से उस चुभती आवाज़ का अलार्म लगाया था जो कह रहा था सपने छोड़ दे बालक और तैयार हो जा अपनी असली जिंदगी के लिए। मैंने उसे बंद करके खुद को समझाना चाहा की अभी भी पाचं मिनट और सपने देख सकता हूँ तभी एक नयी आवाज़ के साथ फ़ोन बज गया ,मेनेजर साहेब का, मैंने आवाज़ बदल के उनसे बात करके उन्हें ये एहसास दिलाना चाहा की मैं निकल चूका हूँ जंग के लिए , लेकिन उधर से आवाज़ आई दस बजे मिलो। घडी देखी तो नौ बज चुके थे नहाना मुश्किल था किसी तरह कौवा नाहन करके जैसे ही घर से निकला दस किलोमीटर लम्बा जाम।।।मेरी सुबह हो चुकी थी पंद्रह मिनट के रास्ते के लिए मुझे डेढ़ घंटे लग गए थे , जैसे तैसे मालिक के पास पंहुचा , उन्होंने ऊपर से नीचे तक देखा और अंग्रेजी में कहा यू हव तो चेंज अंकुर , और पता नहीं पूरे दुनिया का अर्थशास्त्र समझा दिया और मुझे अमर्त्य सेन समझ के सारा काम दे दिया। सच कहूँ तो मेरी कुछ समझ ही नहीं आया क्यूंकि मैं अभी भी प्रेमचंद के पात्र दुक्खी में घूम रहा था और जाम में बिताये डेढ़ घंटे की यात्रा से बाहर न आ सका था।
बहरहाल दो इडली खाने के बाद जब ईमेल देखी तो एहसास हुआ की काम अमर्त्य सेन के बस का भी नहीं है , इसे सिर्फ महाराज गूगल कर सकते हैं , उनकी शरण में जा ही रहा था की सन्देश आया "हे अंकुर आई ऍम गोइंग अमेरिका " मुझे तुरंत सन्देश भेजने वाले का चेहरा याद आया कैसे वो ३ साल पहले जिंदगी से हार निराश लग रहा था और मेरे पास आके कहा था नौकरी नहीं तो कुछ नहीं, खैर अब उसके नौकरी भी थी और छोकरी भी वीसा के साथ। मैं बहुत जल्दी यादों में खो जाता हूँ , और मुझे फिर बनारस की वो सुबह याद आ रही थी जब माँ बड़े प्यार से आवाज़ देके उठा रही थी और घने कोहरे को देख के रजाई तान के दुबक चूका था , पिताजी आये और कहे अब धरती पे लात मार दीजिये , ऐसा क्यूँ होता है की पिताजी की एक आवाज़ से ही सारे काम हो जाते हैं। काम से याद आया मैं अमर्त्य सेन हूँ और मुझे अभी अभी मेरी कम्पनी को मुनाफा देने का काम मिला है , खैर मैंने भी एक आवाज़ लगायी और एक और अमर्त्य सेन जूनियर को बुला के सार काम उसे सौंप दिया और चाय पीने चल दिया। मशीन की बनी चाय कितनी भी अच्छी हो चाय नहीं होती , पर तभी पीछे से आवाज़ आई हे मैन वास्सुप , मैंने देखा तो एक एकदम जेंटलमैन माफिक दिखने वाला आदमी जो लगता था की अमेरिका और इंग्लैंड में ही पैदा हुआ है बुला रहा था, मुझे याद नहीं वो कौन था जब बात की तो याद आया ये तो गाजीपुर का एक पुराना मित्र था जो इंग्लैंड और अमेरिका जा चूका था पर अंग्रेजी अभी भी बना के बोल रहा था, उससे पता चला की यदि आप सॉफ्टवेर कंपनी में हैं तो विदेश जाना बहुत जरुरी है।मैंने सहमती में सर हिलाया और उसी के अंदाज़ में उसे कहा ओके मैन बाए, मैं फिर सोच में डूब गया यहाँ हर आदमी एक दूसरे को मैन मैन क्यूँ कहता है, क्या ये सभी नपुंसक हैं या मैन बोलने से ही विदेश जाते हैं।। वापस आया तो मेनेजर साहेब मिल गए उन्होंने जो भी कुछ पुछा मैंने सब का जवाब हाँ में दिया और कहा शाम तक आपको मिल जायेगा, फिर अमर्त्य सेन जूनियर को बुला के पुछा भाई कुछ हुआ उसने कहा गूगल डाउन है ज्यादा कुछ नहीं हो पा रहा। मैं फिर सोच में डूब गया की अगर गूगल डाउन हो जाए तो ये सब जेंटलमैन मैन से मानव बन जायेंगे और पाषाण युग वापिस आ जायेगा। भोजन का समय हो चूका था , कैंटीन में जाके मेनू देखा तो लगा की वहां जो भी कुछ लिखा है वो सब दूसरी दुनिया की चीजें हैं , ये बाथ वो बाथ , उत्तू कुट्टू , आम्भर साम्भर। फिर मुझे एहसास हुआ मैन लोग यही खाते हैं। मैंने भोजन का ख्वाब छोड़ एक कप चाय और मारी और वापिस आ गया। ईमेल पे ईमेल थी मैंने उनका सब्जेक्ट पढ़ के डिलीट किया और गूगल देवता का आव्हान किया , इस बार वो प्रकट हुए और आशीर्वाद दिया , काम हो गया , पर मैंने शाम तक का वक़्त माँगा था तो आराम से गूगल देवता पे अन्य चीजों जैसे समाचार, तस्वीरें, खेल आदि को देखने लगा , अगर मुझे कोई ये करते दूर से देखेगा तो उसे लगेगा मैं सचमुच का बहुत ग्यानी सॉफ्टवेर ज्ञाता हूँ। दोपहर बीत रही थी इतने में एक और मैन आके पूछते हैं व्हेन यु आर गोइंग तो अमेरिका , मैं झुंजला चूका था अमेरिका सुनके , मैंने उनसे कहा नेवर , आयी एम् हैप्पी ..., फिर सोच में डूब गया , क्या मैं सही में खुश हूँ , इस बर्गर और काफी से ?? इस गूगल और सॉफ्टवेर से ?, इस मेनेजर और खुद से? शनिवार और रविवार की छुट्टी से? इस वातानुकूलित आफिस से?? मैन मैन से? डॉलर पौंड से? इन्सौर्सिंग आउटसोर्सिंग से? कॉर्पोरेट से? तभी सन्देश आया सेंड डॉक्यूमेंट ...मैं अपनी कुर्सी से उठा और बस चल दिया डॉलर से बाहर , कंप्यूटर से बाहर , ऐ सी से बाहर , मैन मैन से बाहर और वापिस जा पंहुचा अपनी उसी रजाई में प्रेमचंद को हाथ में लिए झूरी और दुक्खी को सोचते हुए, भारत को सोचते हुए और ये सोचते हुए की कब तक सोचता ही रहूँगा ...कब कुछ करूँगा?? कब कुछ बनूँगा ?? अभी इंजिनियर बनना बाकी है अभी हिंदुस्तानी बनना बाकी है, अभी दुक्खी और झुरी के लिए कुछ करना बाकी है ....अभी आज़ाद होना बाकी है। अलार्म बज रहा था और मैं शायद सपना ही देख रहा था।
बस तू ही दिखाई देती है महकते फूलों मे ओस की बूदों में बादलों के चेहरों में झरनों की लहरों में अमुआ की बौर में झूमते हुए मोर में
वीणा की तान में रागों के गान में बस तू ही सुनाई देती है सन्नाटों को चीरती कहीं दूर तेरी आवाजें सुनायीं देतीं हैं खामोश इस बंद चारदीवारी में तेरी धड़कने सुनाईं देती हैं तू स्वप्न है या मेरी परिकल्पना मेरी आस्था है या निश्चल भावना ? नहीं तू, मेरी भावों की बहती सरिता है नैराश्य को दूर करती कविता है हर क्षण तेरी रश्मि निहारता हूँ बहना चाहता हूँ गुनगुनाना चाहता हूँ पर जितना तेरे करीब आता हूँ उतना ही दूर चला जाता हूँ।।
बदन को सिहराती हुई कंपकंपाती सी ये बूँदें हृदय के तार झंकृत कर भवरों के स्वरों से गुंजित कुछ गुनगुनाती सी ये बूँदें।।
ये बूँदें ही तो हैं जो सपनो को यौवन की गति से उडाती हैं तितलियों को पुष्प से मिलातीं हैं अंकुर को अंकुरित कराती हैं।।
परन्तु , एस़ी के अन्दर से तेरा एहसास ही नहीं होता आज भीगना चाहता हूँ ये सूट भीगने नहीं देता। दौड़ना चाहता हूँ इस बारिश में लैपटॉप चलने नहीं देता।। सिर्फ फेसबुक पे फील कर रहा हूँ ऐ बरखा ये कॉर्पोरेट तुझसे मिलने नहीं देता।।
ऐ दर्द अब ठहर जा , बीते हुए लम्हे गुजर जा चाह के भी मैं तुझको भूल नहीं पाता खोया रहता हूँ तुझमे पर तुझको ढूँढ नहीं पाता कैसा बेनाम दर्द है ये एक खंडहर आशियाना है आईना मेरा है रूह तेरी है और अक्स भी तेरा ही नज़र आता है??
कब है होली ? ये सुनते ही गब्बर याद आता है, कल जब एक कन्नडिगा मित्र ने पूछा तो एहसास हुआ अरे एक और त्यौहार एक और अद्भुत स्मृति और भावनाएं मुझसे काफी दूर जा चुकी हैं ..
होली सिर्फ एक त्यौहार नहीं , बनारसी के लिए जबरदस्त उत्साह , उमंग और सबसे खूबसूरत भाव है,
शुरुआत
तो काफी महीनो पहले से हो जाती है जब दुनिया भर के कूड़ा , पेड़ , पौधा काट
के होलिका लगाना शुरू होता था , जो मिला झोंक दो साला सब जल जायेगा ....एक
दिन पहले लिजुरी (उपटन) छुड़ाई जाती थी ( सरसों का पेस्ट ) ..लगता था मैं
कितना गोरा हो गया हूँ , और फिर उसे भी झोंक देता था होलिका में ये सोच के
की बुरे का नाश हो गया और मैं फिर से संत बन गया।।
मुझे याद आता है
तीन चार दिन पहले से ही मैं माँ से पूछने लगता गुझिया कब बनेगी, लड्डू कब
बनेगा , ये वाला लड्डू क्यूँ नहीं बना रही, वो नमकीन ये नमकीन बड़ा और न
जाने क्या क्या .पर वो सबकुछ बनातीं थीं और मैं मस्त होके अपना निर्णय
देता था ये कम है ये ज्यादा ...बस खाता रहता खाता रहता ...
होली की सुबह आठ बजते ही माँ वेसिलीन की आधी डिबिया मेरे चेहरे पर लगा देतीं थीं ( थोप देतीं थी ) रंग से बचाने के लिए,
सबसे
फटी पुरानी शर्ट को पहन कर मैं इंतज़ार करने लग जाता था अपनी टोली का ,
मुझे बिना निराश किये वो जल्दी से प्रकट होते थे , और फिर होता था घमासान ,
कॉलोनी का कोई लड़का बचने न पाए , कोई रोड छूट न जाये , हर कोई लाल नीले रंग पे पुता होना चाहिए, कहीं कहीं किस्मत अच्छी रहती तो गुझिया भी खाने को मिल जाती थी।
होली
में हमारे मुख्य शत्रु वे अंकल के घर होते जो हमे क्रिकेट की गेंद घर में
जाने पे नहीं लौटते थे, वो बच्चे जो काफी हीरो बनते थे उनका विशेष स्वागत
किया जाता था ....फगुआ के बारे में मेरी जानकारी थोड़ी कम थी तब पर कानो में
फटीचर भोजपुरी गाने सुनाई देते रहते थे ...
हर उम्र वालों की अपनी टोली थी।।बड़े , बुजुर्ग , जवान , लड़के और आंटी ...
.दोपहर
होते होते थकान अपने चरम पर होती थी , खेलने से ज्यादा रंग छुड़ाने के
कारण , और उस समय जो खाना माँ खिलाती थी वो अमृत से कम न होता , पूरी
इत्यादी व्यंजनों से सुसस्जित अध्बुत थाली ....
फिर शुरू होता तीसरा चरण जो लम्बा चलता हफ्तों चलता
, हर व्यक्ति एक दूसरे के घर जाता , टीका लगाता ( इतना रंग खेलने के बाद
पता नहीं इसकी क्या जरुररत ) गुझिया आदि बेहतरीन पकवान और फिर दुसरे घर पे
चलके वही पकवान ...पकवान पकवान टीका टीका ....
सबसे खुबसूरत बातें
जो मैं महसूस करता था , परीक्षाएं लगभग खत्म हो जाती थीं , और मौसम में
हलकी गर्मी का गज़ब एहसास होता था , आम में बौर आ जाता था , हर तरफ एक उमंग
महसूस होती थी ...दिमाग में सिर्फ खेलना और खेलना ...
फिलहाल
अभी अभी ऑफिस से आया हूँ, कुछ जगह पिचकारी की दुकाने देखीं , पर खाली ही
थीं, कल होली है इसका कोई एहसास दूर दूर तक नहीं है , छुट्टी भी नहीं है और
मालिक कहें हैं काम पे जरुर आना है , न कोई होलिका है न कोई लिजुरी ...ना
कोई उमंग न तरंग, लोग भाग रहे हैं, कोई टेस्टिंग कर रहा है कोई डेवेलोप ,
कोई बिज़नस प्लान बना रहा है .......
फिर भी यही आशा करता हूँ की जो भी
इस त्यौहार को मना रहें हैं पूरे उत्साह और उमंग से मनाये ...जीवन में नयी
उमंग एवं आशाओं का संचार करें ...
अब मुझे फगुआ और ठुमरी जरुर अच्छी
लगती है ..जाते जाते आपको छोड़े जा रहा हूँ उस होली गीत के साथ जो मुझे सबसे
ज्यादा पसंद है, पंडित जी की बेहतरीन आवाज़ और काशी में भोलेनाथ की होली ,
इस पर भी चर्चा करेंगे फिर कभी ...होली की शुभकामनायें।।।
14 जनवरी हर बनारसी के लिए खास होता है और मैं कोई अपवाद नहीं, वो जाड़े की
ठंडक , फिर भी सुबह जल्दी उठाना, तुरंत नहाना ( ये मेरे लिए एक अपवाद होता
था जाड़ों में पर माँ के डर से इस दिन जरुर नहाते थे वरना पतंग उड़ाने की
मंजूरी नहीं मिलती थी।)..नहाने के बाद मटर की सलोनी ताज़ी धनिया की खुशबु के
साथ, भुना हुआ चूड़ा, तिल के लडडू , मूंगफली की पट्टी, रामदाने का स्वाद ,
और सबसे ख़ास पतंग, एक कटी पतंग की कीमत एक रुपये कभी नहीं होती ये एक
पतंग बाज जानता है, कटी पतंग को लूटने का जो आनंद है वो अभूतपूर्व है,
संक्रांति के दिन अरी रजा भाक्काते का शोर अगर नहीं मचाया तो शुभ नहीं।
एक
सच्चा पतंगबाज जनता है की उसकी सारी कला की परीक्षा इसी दिन होती है,
किसने कितने पेच लडाये , कितनी सफलता मिली, ये सब मेरे दिल और दिमाग में
घूमता रहता था। सबसे खास होता था किसी कटी पतंग की डोर नोच लेना जिसे हम
देसी भाषा में हथ्हा नोचना कहते थे।। खिचड़ी के एक दिन पहले ही सारी
पतंगों में कन्ना बाँध लेना , परेता में पूरा सद्दी , और मंझा से लैस तैयार रहता था मैं 14 जनवरी के लिए।।
पर
ये तो इतिहास हो चुका है अब मेरे लिए, कल 14 जनवरी है , मेरे अन्दर कोई
जूनून नहीं , कोई आनंद नहीं, घर से हज़ारों किलोमीटर दूर, एक 3 BHK फ्लैट के
एक कमरे में लैपटॉप के सामने एक PPT तैयार कर रहा हूँ, कल ऑफिस जाना है ,
बॉस जी को उनके प्रॉफिट के बारे में बताना है , गुड़ , पट्टी, ढूंडा , और
पतंग ये शब्द कोई अर्थ नहीं रखते , जाड़े का नामोनिशान नहीं है, सूरज
उत्तरायण हो रहा है पर मेरे लिए मेरा ऑफिस वही दक्षिणायन पे है।।
कुछ
लोग गन्ना जरुर बेच रहे हैं पर मेरे दांत इतने मजबूत नहीं की उन्हें खा
सकूँ, हर जगह की अपनी परम्पराएं होती हैं, पर कॉर्पोरेट जगत की एक ही
परंपरा है लाभ , मैं कॉर्पोरेट जगत में हूँ , मैं सफ़ेद कालर नौकरी करता
हूँ, फर्राटा अंग्रेजी बोलता हूँ, बरिस्ता में कॉफ़ी पीता हूँ, आरामदायक
गाडी में चलता हूँ, अमेरिका यूरोप के लोगों से बातें करता हूँ , सबके लिए
मैं एक बिकने लायक सामान हूँ, जिसने अच्छी बोली लगाई मैं उसका हो गया ,
आज इस कंपनी में हूँ , कल दूसरी में मिलूँगा, आज बरिस्ता में तो कल
जॉर्जिया में कॉफ़ी पीयूँगा, लेकिन 14 जनवरी का असली आनंद से मेरा कोई
वास्ता नहीं, महा कुम्भ मेले से मेरा कोई वास्ता नहीं, खुद से मेरा कोई
वास्ता नहीं, सूर्य के उत्तरायण से मेरा कोई वास्ता नहीं कोई अनुभूति नहीं ,
एयर कंडीशनर में जो रहता हूँ, मैं कॉर्पोरेट एम्प्लोयी हूँ। क्या मैं बनारसी हूँ??