मेरी पहचान
कोहरे में सिमटी धूल में लिपटीसन्नाटों में है चीखती वो लहूलुहान
कहाँ है मेरी पहचान?
पिछली बारिश में देखा था उसे भीगते हुए
खिलखिलाते हुए महकते हुए।
सावन तो इस बार भी बरसे हैं
पर हम एक एक बूँद को तरसे हैं।।
खो गयी है अब वो मुस्कान
कहाँ है मेरी पहचान?
हर प्रत्युष है एहसास दिलाता
समय से पहले और भाग्य से ज्यादा
कोई नहीं है पाता
तो तू कौन सा अपवाद है ?
तेरे हृदय में तो न प्रीत है न प्यास है।
सुन अपने हृदय से आती उस आवाज़ को
सरिता को सागर से मिलने की प्यास को
और कर संकल्प हिमालय को पिघलाने का
अपने पंछी को क्षितिज से मिलाने का।।
हुआ है विजयी वही जिसने स्वयं को पहचाना है
ज्ञान को तलाशा है और भय को त्यागा है
फल को छोड़ केवल निरंतर कर्म को माना है।।
अंकुर "बनारसी"
