बहुत दिनों से कुछ कहना चाहता था हमारे देश में हो रहे धर्म प्रचार पे...इस पिक्चर ने वो सब कह दिया...मैं आज तक तिरुपति नहीं गया क्यूंकि जाने की भावना ही नहीं आई...वहां बस पैसा के बारे में सुना...यही भावना शिर्डी के लिए भी आती रही ...हाल में ही जब मैंने निर्मल बाबा और गुरु मैया को देखा तो एहसास हुआ की ये देश को लूटना इतना आसन क्यूँ था,...क्यूँ है....कहीं न कहीं हमारे देश में शिक्षा की परिभाषा गलत है.....हम सभी सही रूप से शिक्षित नहीं...खैर बात कुछ और करनी थी..
इश्वर कौन है कहाँ है क्या है...ये एक सरल प्रश्न है...मेरे अब तक के अनुभव के पश्चात आनंद ही इश्वर का दूसरा नाम है ..जिंदगी जीने का आनंद , दौड़ में हारने का आनंद , चोर द्वारा चोरी करने का आनंद, कई सालों बाद घर लौटने का आनंद, बिछड़े हुए को मिलाने का आनंद और खुद को खोने का आनंद....अगर आपको किसी भी चीज़ को करने में आनंद आ रहा है तो वो ईश्वरीय है....अब आप कहेंगे निर्मल बाबा हमे लूट रहे थे , तो मैं कहूँगा हाँ वो उनका आनंद था और उन्हें इश्वर मिल रहे थे...बाकी हम अपने कर्मो का फल स्वयं भोगते हैं , और आपको एक बात बता दूँ जिसे आप सोच रहे हैं की वो सबसे बड़ा दुष्ट है और प्रसन्न है, उसके घर में झाँक के देखिये आप अपने कष्टों को भूल जायेंगे...
फिर भटक गया...मै थोडा दुखी हूँ..जिस देश में रामकृष्ण परहम्सा, विवेकानंद, परह्म्स योगानंद जैसे संत रहे हैं...( ये सभी भगवद गीता के अनुसार साधू हैं जैसा सिनेमा में भी कहा है...) और वर्तमान समाया में स्वामी रामभद्राचार्य , जगद्गुरु कृपालु जी महाराज, स्वामी अवधेशानंद जैसे ज्ञानी मौजूद हैं...उसके बावजूद हम सही और गलत का निर्णय करने में अक्षम हैं...ज्ञान प्राप्ति के लिए सही गुरु का होना सबसे आवश्यक है और आज के समय में मै सही गुरु का अभाव देखता हूँ जो हमे भगवद गीता जैसे ग्रंथों का सही अर्थ समझा सकें...एक छोटी सी भावना बताना चाहूँगा जो मैंने महसूस की इस्कान मंदिर जाके...पूरा माहौल मुझे एक बाज़ार जैसा लगा ..वह चाट और पस्ट्री भी बिक रही थी...कृष्ण के दर्शन के लिए जो मार्ग इस्कान वालों ने बनाया है उसी पे चल के उन तक जाना होगा..उनकी किताबें देखनी होगी , उनके लोगो से मिलना होगा, तब कृष्ण की मूर्ति के दर्शन होंगे...यही नहीं भगवद्गीता जिसका दाम पचास या साठ रुपये है गीता प्रेस में, वो पांच सौ से हजारों रुपये की है.वहां पे.....मै किसी के खिलाफ या किसी को गलत नहीं ठहरा रहा मै कहना चाह रहा हूँ आखिर ज्ञान प्राप्ति में इतनी बंदिशें क्यूँ...क्यूँ हाथ उठा के ही मै हरी बोल कहूँ..क्यूँ मै वो करूँ जो मुझे कहीं से भी तर्कसंगत नहीं लगता ..लेकिन मै ही नहीं हम सभी करते हैं..और निर्मल बाबा और गुरु माता जैसे लोग आस्था के नाम पे खिलवाड़ करते हैं..मैं तो सिर्फ इतना जनता हूँ की मन से यदि हम कोई भी बुरी भावना को दूर करते हैं तो वो इश्वर की प्राप्ति है और सच्चे आनंद की प्राप्ति है....
भारत सरकार से एक निवेदन करना चाहूँगा की इस सिनेमा को टैक्स फ्री करें और हर गाँव शहर में दिखाएं..ताकि फिर से कोई ये न कहे की ये गुरु माता है इनमे माता है और इनहे एक किलो सोना चढाओ दो किलो हो जायेगा...साक्षरता का सही अर्थ समझें और हाँ ईश्वरीय ज्ञान के लिए सही गुरु की तलाश जारी रखें...मै भी कर रहा हूँ...
नोट: यहाँ कहीं सभी बातें अजीब सी और बेतुकी लग सकती हैं..कृपया अपना दिमाग खुला रखें.....
इश्वर कौन है कहाँ है क्या है...ये एक सरल प्रश्न है...मेरे अब तक के अनुभव के पश्चात आनंद ही इश्वर का दूसरा नाम है ..जिंदगी जीने का आनंद , दौड़ में हारने का आनंद , चोर द्वारा चोरी करने का आनंद, कई सालों बाद घर लौटने का आनंद, बिछड़े हुए को मिलाने का आनंद और खुद को खोने का आनंद....अगर आपको किसी भी चीज़ को करने में आनंद आ रहा है तो वो ईश्वरीय है....अब आप कहेंगे निर्मल बाबा हमे लूट रहे थे , तो मैं कहूँगा हाँ वो उनका आनंद था और उन्हें इश्वर मिल रहे थे...बाकी हम अपने कर्मो का फल स्वयं भोगते हैं , और आपको एक बात बता दूँ जिसे आप सोच रहे हैं की वो सबसे बड़ा दुष्ट है और प्रसन्न है, उसके घर में झाँक के देखिये आप अपने कष्टों को भूल जायेंगे...
फिर भटक गया...मै थोडा दुखी हूँ..जिस देश में रामकृष्ण परहम्सा, विवेकानंद, परह्म्स योगानंद जैसे संत रहे हैं...( ये सभी भगवद गीता के अनुसार साधू हैं जैसा सिनेमा में भी कहा है...) और वर्तमान समाया में स्वामी रामभद्राचार्य , जगद्गुरु कृपालु जी महाराज, स्वामी अवधेशानंद जैसे ज्ञानी मौजूद हैं...उसके बावजूद हम सही और गलत का निर्णय करने में अक्षम हैं...ज्ञान प्राप्ति के लिए सही गुरु का होना सबसे आवश्यक है और आज के समय में मै सही गुरु का अभाव देखता हूँ जो हमे भगवद गीता जैसे ग्रंथों का सही अर्थ समझा सकें...एक छोटी सी भावना बताना चाहूँगा जो मैंने महसूस की इस्कान मंदिर जाके...पूरा माहौल मुझे एक बाज़ार जैसा लगा ..वह चाट और पस्ट्री भी बिक रही थी...कृष्ण के दर्शन के लिए जो मार्ग इस्कान वालों ने बनाया है उसी पे चल के उन तक जाना होगा..उनकी किताबें देखनी होगी , उनके लोगो से मिलना होगा, तब कृष्ण की मूर्ति के दर्शन होंगे...यही नहीं भगवद्गीता जिसका दाम पचास या साठ रुपये है गीता प्रेस में, वो पांच सौ से हजारों रुपये की है.वहां पे.....मै किसी के खिलाफ या किसी को गलत नहीं ठहरा रहा मै कहना चाह रहा हूँ आखिर ज्ञान प्राप्ति में इतनी बंदिशें क्यूँ...क्यूँ हाथ उठा के ही मै हरी बोल कहूँ..क्यूँ मै वो करूँ जो मुझे कहीं से भी तर्कसंगत नहीं लगता ..लेकिन मै ही नहीं हम सभी करते हैं..और निर्मल बाबा और गुरु माता जैसे लोग आस्था के नाम पे खिलवाड़ करते हैं..मैं तो सिर्फ इतना जनता हूँ की मन से यदि हम कोई भी बुरी भावना को दूर करते हैं तो वो इश्वर की प्राप्ति है और सच्चे आनंद की प्राप्ति है....
भारत सरकार से एक निवेदन करना चाहूँगा की इस सिनेमा को टैक्स फ्री करें और हर गाँव शहर में दिखाएं..ताकि फिर से कोई ये न कहे की ये गुरु माता है इनमे माता है और इनहे एक किलो सोना चढाओ दो किलो हो जायेगा...साक्षरता का सही अर्थ समझें और हाँ ईश्वरीय ज्ञान के लिए सही गुरु की तलाश जारी रखें...मै भी कर रहा हूँ...
नोट: यहाँ कहीं सभी बातें अजीब सी और बेतुकी लग सकती हैं..कृपया अपना दिमाग खुला रखें.....