Saturday, 29 September 2012

मेरा विधान

दरवाजा खोला तो रात फिर खड़ी थी
दिन बीत गया था और आस डूब गयी थी
मैं फिर से हार गया था और किस्मत जीत गयी थी!!
मैंने सोचा क्यूँ इस अंधियारे को ही अपना लूं
खुद को खुद से दूर ले जाकर सन्नाटों में घर बसा लूँ
आखिर किया ही क्या है मैंने जो तू हर पल दस्तक देती है
मेरी तन्हाई और मेरे सपनो को तोड़ कर झूम लेती है!!!!
तेरे सन्नाटे को ही चादर बना के ओढ़ लिया है
और गम को आंसू बना के पी लिया है....
अब सिर्फ मैं हूँ और ये टूटा आइना
जिसमे मेरा अक्स है पर है कोई आत्मा......
 
  ---------------------------------------------------अलबेला बनारसी